मशहूर रैपर किंग ने पंजाबी और रैप म्यूजिक में महिलाओं के चित्रण पर चल रही बहस का करारा जवाब दिया है। उन्होंने संगीत को ‘सब्जेक्टिव’ बताते हुए इसे गंभीरता के बजाय आनंद लेने की सलाह दी।
भारतीय संगीत जगत में ‘तू आके देखले’ और ‘मान मेरी जान’ जैसे चार्टबस्टर गानों से तहलका मचाने वाले लोकप्रिय सिंगर-रैपर किंग (King) ने हाल ही में पंजाबी और रैप म्यूजिक में महिलाओं के वस्तुकरण (Objectification) और स्टीरियोटाइप को लेकर चल रही लंबी बहस पर अपनी चुप्पी तोड़ी है। आईएएनएस (IANS) के साथ एक विशेष बातचीत में किंग ने संगीत के प्रति लोगों के नजरिए और इस उद्योग पर लगने वाले आरोपों पर बेबाकी से अपनी राय रखी। उन्होंने आग्रह किया कि संगीत को एक ‘सब्जेक्टिव’ (विषयगत) कला के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि इसे किसी एक सांचे में कैद किया जाना चाहिए।
“क्या आपने भोजपुरी और बॉलीवुड गाने नहीं सुने?”: किंग का सवाल
जब किंग से पंजाबी गानों में महिलाओं के कथित गलत चित्रण और रूढ़िवादिता को बढ़ावा देने की आलोचना पर सवाल किया गया, तो उन्होंने बहुत ईमानदारी से प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस बहस पर पलटवार करते हुए कहा, “क्या आपने भोजपुरी गाने सुने हैं? क्या आपने बॉलीवुड गाने सुने हैं? लोगों ने बड़े होते हुए वास्तव में कितना संगीत सुना है? संगीत एक बहुत ही व्यक्तिगत और सब्जेक्टिव चीज है।”
किंग का तर्क था कि केवल एक विशेष भाषा (पंजाबी) या जॉनर (रैप) को निशाना बनाना गलत है। उन्होंने याद दिलाया कि मनोरंजन के हर क्षेत्र में विविधता और अलग-अलग तरह का कंटेंट होता है, और किसी एक उद्योग को ‘बॉक्स’ में बंद कर देना कला के साथ न्याय नहीं है।
कलाकार के अनुभव और हिप-हॉप की हकीकत
किंग ने विस्तार से बताया कि एक कलाकार समय, अनुभव और अपने परिवेश के साथ विकसित होता है। उनके अनुसार, संगीत अक्सर जीवन के चरणों और व्यक्तिगत यात्राओं का प्रतिबिंब होता है। उन्होंने कहा, “कलाकार भी इंसान हैं। एक कलाकार ने दस साल पहले कुछ लोगों के साथ या एक निश्चित वातावरण में जो अनुभव किया, वह उसके संगीत में दिखाई दे सकता है। विशेष रूप से हिप-हॉप में, कभी-कभी अनुभवों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है, कभी कच्चे (Raw) तरीके से, तो कभी काव्यात्मक अंदाज में।”
किंग के अनुसार, रैप और हिप-हॉप अक्सर उस वास्तविकता को बयां करते हैं जिसे कलाकार ने करीब से देखा होता है। इसे केवल विवाद की नजर से देखना कला की गहराई को नजरअंदाज करना है।
श्रोताओं की जिम्मेदारी और ‘वाइब’ का जादू
किंग ने न केवल कलाकारों बल्कि श्रोताओं की जिम्मेदारी पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि श्रोताओं को कला को व्यापक अर्थों में समझने की जरूरत है। उन्होंने तर्क दिया, “मेरा मानना है कि हर कलाकार को विकसित होना चाहिए और हर श्रोता को यह समझना चाहिए कि संगीत सब्जेक्टिव है। अगर हम एक चीज को चुनते हैं और कहते हैं कि यह पूरा समुदाय या जॉनर ऐसा ही करता है, तो हम वास्तव में कला को नहीं समझ रहे हैं।”
अक्सर विवादित बोल वाले गानों के लोकप्रिय होने के सवाल पर किंग ने कहा कि इसके पीछे ‘वाइब’ (Vibe) की बड़ी भूमिका होती है। उन्होंने कहा, “कभी-कभी यह शब्दों के बारे में नहीं होता, बल्कि वाइब के बारे में होता है। अगर आपको कोई पेपी (Peppy) नंबर पसंद है, तो आप उसे सुनेंगे। लोग चीजों का आनंद लेते हैं। यह हमेशा पैसे कमाने या बेचने के बारे में नहीं होता।”
“संगीत को ज्यादा गंभीरता से न लें”: किंग की सलाह
किंग ने एक बहुत ही व्यावहारिक सलाह देते हुए कहा कि हमें संगीत को उतना गंभीरता से नहीं लेना चाहिए जितना कि हम लेते हैं। उन्होंने कहा, “हम संगीत को उसकी असलियत से कहीं ज्यादा गंभीरता से लेने लगते हैं। हमें रिलैक्स होने और गानों का आनंद लेने की जरूरत है, बजाय इसके कि हम उन पर बहुत अधिक सोच-विचार करें।” उनके अनुसार, संगीत का प्राथमिक उद्देश्य मनोरंजन और सुकून देना है, और उसे उसी नजरिए से देखा जाना चाहिए।
वर्क फ्रंट: गायकी के बाद अब एक्टिंग में भी जलवा
किंग ने ‘तू आके देखले’, ‘मान मेरी जान’ और ‘OOPS’ जैसे गानों से देश भर में एक वफादार फैनबेस बनाया है। लेकिन अब वे केवल गायक तक सीमित नहीं हैं। किंग ने हाल ही में इंटेंस ओटीटी ड्रामा ‘लुक्खे’ (Lukkhe) के साथ अपना एक्टिंग डेब्यू किया है। इस सीरीज में वे पलक तिवारी, राशी खन्ना और अन्य कलाकारों के साथ स्क्रीन स्पेस साझा करते नजर आ रहे हैं। संगीत की दुनिया में अपनी बादशाहत कायम करने के बाद, किंग अब अभिनय की दुनिया में भी अपनी बहुमुखी प्रतिभा का लोहा मनवाने के लिए तैयार हैं।