लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और सलमान खुर्शीद ने यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों के मिशन प्रमुखों के साथ लंच पर मुलाकात की। बैठक में भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा हुई।
नई दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में उस समय एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय गतिविधि देखी गई, जब लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP) राहुल गांधी ने यूरोपीय संघ (EU) के सभी 27 सदस्य देशों के मिशन प्रमुखों (HoMs) से मुलाकात की। इस उच्च स्तरीय बैठक में उनके साथ कांग्रेस के विदेश मामलों के विभाग के अध्यक्ष सलमान खुर्शीद भी मौजूद थे। शांति निकेतन में यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल द्वारा आयोजित इस दोपहर के भोज (लंच) का उद्देश्य भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ यूरोपीय संघ के जुड़ाव को और गहरा करना था।
यूरोपीय संघ-भारत रणनीतिक साझेदारी को मजबूती
As part of our engagement with 🇮🇳 political parties, 🇪🇺 EU HoMs had lunch with Leader of the Opposition @RahulGandhi & Congress foreign affairs Head @salman7khurshid. We discussed the thriving EU-India strategic partnership, evolving Indian and global geopolitical dynamics. pic.twitter.com/kfZ36b4B2V
— Hervé Delphin (@EUAmbIndia) May 14, 2026
इस विचार-विमर्श का मुख्य केंद्र “फलती-फूलती ईयू-भारत रणनीतिक साझेदारी” रही। भारत में यूरोपीय संघ के राजदूत हर्वे डेलफिन ने इस बात पर जोर दिया कि चर्चा स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों क्षितिजों तक फैली हुई थी। यूरोपीय संघ के लिए भारत एक बहुध्रुवीय दुनिया में एक “स्वाभाविक भागीदार” बना हुआ है। यह बैठक विपक्षी नेतृत्व के लिए वैश्विक शासन, व्यापार और सुरक्षा में भारत की भूमिका पर अपना दृष्टिकोण साझा करने का एक मंच थी। विपक्ष के नेता के साथ जुड़कर, ईयू प्रतिनिधियों ने एक व्यापक राजनीतिक संवाद के महत्व को रेखांकित किया, जो दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर यह सुनिश्चित करता है कि द्विपक्षीय संबंध मजबूत बने रहें।
वैश्विक भू-राजनीतिक बदलावों पर विमर्श
बदलते वैश्विक गठबंधनों और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच, बैठक में “विकसित होती वैश्विक भू-राजनीतिक गतिशीलता” पर गहराई से चर्चा हुई। चूंकि भारत खुद को ग्लोबल साउथ और पश्चिम के बीच एक सेतु के रूप में स्थापित कर रहा है, इसलिए ईयू भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी के दृष्टिकोण को समझने के लिए उत्सुक है। चर्चाओं में लोकतंत्र, मानवाधिकार और कानून के शासन जैसे साझा मूल्यों को छुआ गया—जो ईयू-भारत संबंधों के आधार स्तंभ हैं। एक ऐसे युग में जहां वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) का पुनर्गठन किया जा रहा है और डिजिटल संप्रभुता प्राथमिकता है, राहुल गांधी और 27 राजदूतों के बीच यह आदान-प्रदान एक स्थिर और अनुमानित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाए रखने में आपसी रुचि का प्रतीक है।
आर्थिक प्रभाव और राज्य-स्तरीय जुड़ाव
कांग्रेस नेतृत्व के साथ यह बैठक यूरोपीय संघ द्वारा भारत में किए जा रहे व्यापक राजनयिक आउटरीच का हिस्सा है। इससे पहले मई में, राजदूत डेलफिन ने सीआईआई वार्षिक व्यापार शिखर सम्मेलन 2026 के दौरान महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के साथ बैठक की थी। इन बैठकों ने राज्य स्तर पर यूरोपीय संघ के “व्यापारिक और आर्थिक प्रभाव” पर प्रकाश डाला, जहां यूरोपीय कंपनियां सक्रिय रूप से निवेश कर रही हैं और रोजगार पैदा कर रही हैं। राष्ट्रीय राजनीतिक संवाद और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग के बीच की खाई को पाटकर, ईयू भारत की विकास यात्रा में एक प्रमुख चालक के रूप में अपनी उपस्थिति को मजबूत कर रहा है।
यूरोप दिवस पर साझा समृद्धि का उत्सव
इन राजनयिक वार्ताओं की गति 9 मई को नई दिल्ली में आयोजित ‘यूरोप दिवस 2026’ समारोह से और बढ़ गई। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थिति में, इस कार्यक्रम ने ईयू-भारत संबंधों में “प्रतीकात्मकता से सार” (Symbolism to Substance) की ओर संक्रमण का जश्न मनाया। इस समारोह ने रेखांकित किया कि यह साझेदारी अब केवल वाणिज्य तक सीमित नहीं है; यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान और जलवायु परिवर्तन व डिजिटल परिवर्तन जैसी वैश्विक प्राथमिकताओं पर रणनीतिक सहयोग तक विस्तृत हो गई है।
एक व्यापक राजनयिक दृष्टिकोण
राहुल गांधी के साथ बैठक कूटनीति के एक परिष्कृत दृष्टिकोण को दर्शाती है, जहां अंतरराष्ट्रीय निकाय एक जीवंत लोकतंत्र में विपक्ष के महत्व को स्वीकार करते हैं। केंद्र सरकार, राज्य के नेताओं और विपक्ष के साथ जुड़ाव को संतुलित करके, यूरोपीय संघ भारत की राजनीतिक नब्ज की समग्र समझ सुनिश्चित कर रहा है। यह 360-डिग्री जुड़ाव यह सुनिश्चित करता है कि ईयू-भारत रणनीतिक साझेदारी “परिणामी और भविष्योन्मुखी” बनी रहे, जो साझा समृद्धि और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति पारस्परिक सम्मान की नींव पर टिकी है। जैसे-जैसे भारत एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है, 21वीं सदी की चुनौतियों से निपटने के लिए ऐसे संवाद अनिवार्य हैं।