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फिल्म ‘पेद्दी’ में जान्हवी कपूर के पात्र के चित्रण पर बढ़ा विवाद। निर्देशक बुच्ची बाबू सना ने दी सफाई। क्या सिनेमा में महिलाओं का वस्तुकरण सही है?
फिल्म ‘पेद्दी’ में जान्हवी कपूर की भूमिका इन दिनों चर्चाओं के केंद्र में है, लेकिन ये चर्चाएं सकारात्मक नहीं हैं। फिल्म में उनके पात्र ‘अछियम्मा’ को जिस तरह से पेश किया गया है, उसे लेकर न केवल दर्शकों और सोशल मीडिया यूजर्स ने, बल्कि फिल्म जगत के कई लोगों ने भी कड़ी आपत्ति जताई है। आरोप है कि निर्देशक बुच्ची बाबू सना ने जान्हवी के चरित्र को एक इंसान के रूप में दिखाने के बजाय, केवल कैमरे के लिए एक ‘प्रॉप’ (वस्तु) की तरह इस्तेमाल किया है। फिल्म के दृश्यों में जान्हवी के शरीर के अंगों, विशेषकर उनकी कमर और छाती पर केंद्रित अनावश्यक क्लोज-अप शॉट्स ने दर्शकों को झकझोर कर रख दिया है। यह न केवल उनकी कलात्मक क्षमता को कमतर आंकता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे कुछ फिल्म निर्माता आज भी महिलाओं को केवल उपभोग की वस्तु समझते हैं।
सुमांगली अरियानायगाम और सोशल मीडिया की कड़ी आलोचना
इस विवाद को तब और हवा मिली जब प्रसिद्ध गायिका सुमांगली अरियानायगाम ने इस पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा की गई अपनी पोस्ट में लिखा, “शक्तिशाली पुरुषों से भरे कमरे में बैठकर एक ऐसी कहानी लिखी गई, जो शक्तिहीन होने के सदमे के बारे में थी। उसी दौरान, उन्होंने जान्हवी कपूर के पात्र को लेंस के लिए एक शरीर, जबरन किस के लिए एक प्रॉप और गानों के खत्म होने के बाद फेंक दी जाने वाली एक वस्तु में बदल दिया।” सुमांगली की यह टिप्पणी फिल्म निर्माण की उस पितृसत्तात्मक सोच पर सीधा प्रहार है, जो मानती है कि महिलाओं की गरिमा उनके ‘बॉक्स ऑफिस नंबरों’ से कम महत्वपूर्ण है। यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई और इसे जान्हवी कपूर द्वारा ‘लाइक’ करने की खबरें भी सामने आईं, जो एक तरह से फिल्म में उनके साथ हुए व्यवहार के प्रति उनके असंतोष को दर्शाता है।
सहमति की अनदेखी और ‘सबसे महंगी बेइज्जती’
विवाद का एक अत्यंत गंभीर पहलू यह है कि जान्हवी कपूर ने कथित तौर पर पोस्ट-प्रोडक्शन के दौरान ही इन आपत्तिजनक शॉट्स पर सवाल उठाए थे। वायरल हो रहे स्क्रीनशॉट्स और रिपोर्टों के अनुसार, अभिनेत्री ने एक पेशेवर सीमा (boundary) तय करने की कोशिश की थी, लेकिन निर्देशक ने उनकी सहमति की परवाह किए बिना अंतिम संपादन में उन दृश्यों को बनाए रखा। यह केवल एक अभिनेत्री के साथ गलत व्यवहार नहीं है, बल्कि यह उस शक्ति संतुलन का भी प्रदर्शन है जहाँ निर्देशक यह तय करता है कि अभिनेत्री की गरिमा का कितना हिस्सा बरकरार रखा जाना चाहिए। सोशल मीडिया पर एक यूजर ने इसे “किसी अभिनेत्री का अब तक का सबसे महंगा अपमान” (most expensive disrespect) करार दिया है। यह दिखाता है कि कैसे एक पेशेवर अभिनेत्री की आवाज को भी बड़े बैनर और निर्देशक की जिद के आगे दबा दिया जाता है।
अभिनेत्री की चुप्पी और साहस के बीच का संघर्ष
फिल्म में जान्हवी कपूर को जिस तरह से दिखाया गया है, वह उद्योग में व्याप्त ‘ओवर-सेक्शुअलाइजेशन’ की समस्या को उजागर करता है। अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि अभिनेत्री ऐसे रोल चुनती हैं, लेकिन ‘पेद्दी’ का मामला अलग है। यहाँ अभिनेत्री ने अपनी सीमाएं स्पष्ट की थीं, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। यह मामला इस बहस को और तेज करता है कि क्या सिनेमा में अभिनेत्री की सहमति केवल कागजों तक सीमित है? हालांकि जान्हवी ने बाद में उस पोस्ट को ‘अनलाइक’ कर दिया या वह दिखाई नहीं दे रही थी, लेकिन जनता ने उस ‘लाइक’ को उनके साहस के संकेत के रूप में देखा।
सिनेमाई जिम्मेदारी और भविष्य की राह
‘पेद्दी’ का यह विवाद भारतीय सिनेमा के लिए एक वेक-अप कॉल है। मनोरंजन के नाम पर महिलाओं का वस्तुकरण अब पुराना पड़ चुका है और दर्शक इसे कतई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं। जब एक अभिनेत्री खुद अपने चरित्र के गलत चित्रण पर सवाल उठाती है, तो उस पर ध्यान देना निर्देशक की नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है। यदि रचनात्मक स्वतंत्रता का उपयोग किसी के आत्म-सम्मान को कुचलने के लिए किया जा रहा है, तो ऐसी फिल्म की सफलता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अंततः, सिनेमा को दर्शकों के लिए प्रेरणा और आनंद का जरिया होना चाहिए, न कि किसी के लिए अपमान का। ‘पेद्दी’ के मेकर्स के लिए यह एक सबक है कि बॉक्स ऑफिस की कामयाबी मानवीय गरिमा से ऊपर नहीं हो सकती। यदि उद्योग को वाकई प्रगतिशील बनना है, तो उसे महिलाओं के प्रति अपनी दृष्टि और संवेदनशीलता में आमूलचूल बदलाव लाने होंगे।