ऑर्गनाइजर’ ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) को बताया विघटनकारी, सोशल मीडिया नैरेटिव पर छिड़ी बहस

ऑर्गनाइजर' ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) को बताया विघटनकारी, सोशल मीडिया नैरेटिव पर छिड़ी बहस

आरएसएस की पत्रिका ‘ऑर्गनाइजर’ ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) पर तीखा हमला बोला है। इसे युवाओं को सरकार के खिलाफ भड़काने वाला और ‘संस्थागत पतन का खाका’ करार दिया है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ी साप्ताहिक पत्रिका ‘ऑर्गनाइजर’ ने हाल ही में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नामक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की तीखी आलोचना करते हुए दो लेख प्रकाशित किए हैं। इन लेखों में CJP को एक विघटनकारी डिजिटल एक्टिविज्म करार दिया गया है। पत्रिका का आरोप है कि यह प्लेटफॉर्म व्यंग्य और युवाओं के जुड़ाव की आड़ में सरकार विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दे रहा है और इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय युवाओं को सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ भड़काना है। यह विवाद सोशल मीडिया पर तेजी से बढ़ते इस प्लेटफॉर्म के प्रभाव को लेकर बहस का नया केंद्र बन गया है।

‘कॉकरोच सिंड्रोम’ और संस्थागत अस्थिरता का आरोप

कृष्णकुमार कैमल द्वारा लिखित लेख, जिसका शीर्षक “कॉकरोच सिंड्रोम: द न्यू फेस ऑफ एंटी-इंडिया टेक सिनिसिज्म” है, में दावा किया गया है कि CJP के पीछे एक वामपंथी राजनीतिक पारिस्थितिकी तंत्र सक्रिय है। लेख के अनुसार, इस आंदोलन को ‘जेन-जी’ (Gen Z) आधारित व्यंग्य अभियान बताकर महिमामंडित किया जा रहा है, लेकिन इसका गहरा विश्लेषण करने पर यह “संस्थागत पतन का एक खाका” (Blueprint for institutional collapse) प्रतीत होता है। लेखक का तर्क है कि इसे ऑनलाइन विद्रोह और युवा राजनीति की भाषा में पैक करके परोसा जा रहा है, ताकि संस्थानों की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया जा सके।

विदेशी कनेक्शन और विचारधारात्मक इंडोक्ट्रिनेशन

डॉ. पंकज जगन्नाथ जायसवाल द्वारा लिखित दूसरे लेख, “कॉकरोच जनता पार्टी: अ बिड टू इंडोक्ट्रिनेट जेन-जी अगेंस्ट द गवर्नमेंट” में और भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। लेख में दावा किया गया है कि यह पहल अमेरिका स्थित आम आदमी पार्टी के एक समर्थक द्वारा शुरू की गई है। लेख यह भी आरोप लगाता है कि इस सोशल मीडिया अभियान को पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की और अमेरिका जैसे देशों से तेजी से फॉलोअर्स मिले हैं। पत्रिका का मानना है कि इस अभियान का व्यापक उद्देश्य युवाओं को प्रभावित कर देश में सरकार विरोधी भावनाएं पैदा करना है।

विवादास्पद मांगों पर वैचारिक मतभेद

लेखों में CJP द्वारा उठाई गई विभिन्न मांगों की कड़ी आलोचना की गई है। उदाहरण के लिए, अडानी ग्रुप और रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़ी मीडिया संस्थाओं के लाइसेंस रद्द करने की मांग को ‘स्वतंत्र व्यावसायिक हितों’ पर हमला माना गया है। इसके अलावा, चुनाव आयोग के खिलाफ कड़े कदम उठाने और मुख्य चुनाव आयुक्त पर UAPA के तहत कार्रवाई की मांग को लोकतांत्रिक संस्थाओं को डराने की कोशिश बताया गया है।

कैबिनेट पदों पर महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण, दलबदल पर 20 साल का प्रतिबंध और पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति पर रोक जैसी मांगों को भी ‘प्रतिक्रियावादी’ बताया गया है। लेखक का तर्क है कि ये प्रस्ताव संवैधानिक प्रक्रियाओं, चुनावी जनादेश और प्रशासनिक व्यावहारिकता को नजरअंदाज करते हैं। इन्हें व्यक्तिगत शिकायतों से प्रेरित और लोकतांत्रिक लचीलेपन को कमजोर करने वाला बताया गया है।

लोकतंत्र बनाम ‘शिकायत की संस्कृति’

इन लेखों का सार यह है कि CJP आंदोलन राष्ट्र निर्माण या रचनात्मक लोकतांत्रिक जुड़ाव के बजाय एक “शिकायत की संस्कृति” (Culture of grievance) को बढ़ावा दे रहा है। पत्रिका का मानना है कि इस तरह का डिजिटल एक्टिविज्म अंततः लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव को खोखला करने का काम करता है। लेखकों ने आगाह किया है कि युवाओं को ऐसे ‘ऑनलाइन विद्रोह’ के प्रति सचेत रहना चाहिए जो तार्किक सुधारों के बजाय अराजकता को जन्म देते हैं।

‘ऑर्गनाइजर’ द्वारा प्रकाशित ये लेख देश में बढ़ते डिजिटल राजनीतिक सक्रियता और नैरेटिव वार का एक प्रमुख उदाहरण हैं। जहां CJP समर्थकों के लिए यह एक ‘व्यंग्य आधारित जन-आंदोलन’ हो सकता है, वहीं वैचारिक विरोधियों के लिए यह राष्ट्रीय हितों के खिलाफ एक सुनियोजित अभियान है। यह बहस स्पष्ट करती है कि डिजिटल युग में राजनीति का रंग बदल रहा है, जहां सोशल मीडिया की एक पोस्ट अब बड़े राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। अंततः, इस तरह के अभियानों का मूल्यांकन निष्पक्षता और संवैधानिक ढांचे के दायरे में रहकर किया जाना आवश्यक है।

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