NSE ने Nifty Closing Price विवाद पर दी सफाई, जानिए क्यों दिखी 200 अंकों से ज्यादा की उछाल

NSE ने Nifty Closing Price विवाद पर दी सफाई, जानिए क्यों दिखी 200 अंकों से ज्यादा की उछाल

 

NSE ने Nifty 50 के Closing Auction Session के पहले दिन 200 अंकों से अधिक के अंतर पर सफाई दी है। एक्सचेंज ने कहा कि यह अचानक आई तेजी नहीं, बल्कि नए क्लोजिंग ऑक्शन मैकेनिज्म का प्रभाव है।

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने सोमवार देर रात एक विस्तृत स्पष्टीकरण जारी कर निफ्टी 50 के क्लोजिंग प्राइस को लेकर पैदा हुए भ्रम को दूर करने की कोशिश की। दरअसल, Closing Auction Session (CAS) के पहले ही दिन निफ्टी 50 के डिस्कवर्ड क्लोजिंग प्राइस और दोपहर 3:15 बजे के स्तर के बीच 200 अंकों से अधिक का अंतर देखने को मिला। इस असामान्य बदलाव ने बाजार में हलचल मचा दी और कई निवेशकों व ट्रेडर्स ने सवाल उठाए कि आखिर बाजार बंद होने से पहले अचानक इतनी बड़ी तेजी कैसे आ गई।

हालांकि, एनएसई ने स्पष्ट किया कि बाजार में किसी प्रकार की अचानक उछाल नहीं आई थी। यह अंतर केवल नए Closing Auction Session की प्रक्रिया और क्लोजिंग प्राइस तय करने के तरीके की वजह से दिखाई दिया।

क्या है पूरा मामला?

सोमवार को पहली बार F&O (फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस) शेयरों के लिए नए Closing Auction Session (CAS) को लागू किया गया। बाजार बंद होने के बाद जब निफ्टी 50 का Discovered Closing Price सामने आया, तो वह 3:15 बजे के स्तर से 200 अंकों से अधिक ऊपर दिखाई दिया।

इससे सोशल मीडिया और ट्रेडिंग समुदाय में भ्रम की स्थिति बन गई। कई निवेशकों को लगा कि अंतिम कुछ मिनटों में बाजार में भारी खरीदारी हुई और निफ्टी में तेज उछाल आ गया। लेकिन वास्तविकता इससे अलग थी।

NSE ने क्या दी सफाई?

एनएसई ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि निफ्टी में कोई वास्तविक या अचानक उछाल नहीं आया था। एक्सचेंज के अनुसार, Closing Auction Session के दौरान अंतिम क्लोजिंग प्राइस का निर्धारण एक अलग प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है, जिसमें ऑर्डर मैचिंग और मूल्य खोज (Price Discovery) का नया तरीका अपनाया जाता है।

यानी जो क्लोजिंग प्राइस निवेशकों को दिखाई दिया, वह केवल अंतिम समय के ट्रेड का परिणाम नहीं था, बल्कि पूरे क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान प्राप्त ऑर्डर्स के आधार पर तय किया गया मूल्य था।

Closing Auction Session कैसे करता है काम?

सेबी और एनएसई द्वारा लागू किया गया Closing Auction Session बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने और क्लोजिंग प्राइस को अधिक सटीक बनाने के उद्देश्य से शुरू किया गया है।

इस प्रक्रिया में बाजार बंद होने के बाद एक निश्चित समय के लिए खरीद और बिक्री के ऑर्डर एकत्र किए जाते हैं। इसके बाद उपलब्ध मांग और आपूर्ति के आधार पर ऐसा मूल्य तय किया जाता है, जिस पर सबसे अधिक ऑर्डर निष्पादित हो सकें। इसी मूल्य को Discovered Closing Price कहा जाता है।

इसलिए कई बार यह कीमत 3:15 बजे के अंतिम कारोबार मूल्य से अलग दिखाई दे सकती है।

निवेशकों में क्यों फैला भ्रम?

अधिकांश निवेशक अभी तक पुराने क्लोजिंग सिस्टम के आदी थे, जहां बाजार बंद होते ही अंतिम ट्रेडिंग मूल्य को ही क्लोजिंग प्राइस माना जाता था। नए सिस्टम के पहले दिन जब निफ्टी का डिस्कवर्ड क्लोजिंग प्राइस काफी अलग दिखाई दिया, तो कई लोगों ने इसे वास्तविक बाजार उछाल समझ लिया।

विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे निवेशक इस नई प्रक्रिया को समझेंगे, भविष्य में ऐसी गलतफहमियां कम होती जाएंगी।

बाजार की पारदर्शिता बढ़ाने की पहल

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि नया Closing Auction Session लंबी अवधि में निवेशकों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। इससे क्लोजिंग प्राइस अधिक निष्पक्ष तरीके से तय होगा और अंतिम समय में कीमतों में कृत्रिम उतार-चढ़ाव की संभावना कम होगी।

यह व्यवस्था विशेष रूप से उन निवेशकों और संस्थागत फंडों के लिए महत्वपूर्ण है, जो क्लोजिंग प्राइस के आधार पर अपने पोर्टफोलियो का मूल्यांकन करते हैं।

ट्रेडर्स को नई प्रणाली समझने की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल निवेशकों और ट्रेडर्स को इस नई प्रणाली को समझने की आवश्यकता है। शुरुआती दिनों में तकनीकी कारणों और प्रक्रिया की जानकारी की कमी के कारण भ्रम की स्थिति बन सकती है, लेकिन समय के साथ यह प्रणाली सामान्य हो जाएगी।

एनएसई की ओर से जारी विस्तृत स्पष्टीकरण का उद्देश्य भी यही था कि निवेशकों को यह स्पष्ट हो सके कि सोमवार को निफ्टी में दिखाई देने वाली 200 अंकों से अधिक की बढ़त किसी वास्तविक अचानक तेजी का संकेत नहीं थी।

आगे क्या रहेगा असर?

आने वाले दिनों में बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि Closing Auction Session का शेयरों की लिक्विडिटी, मूल्य निर्धारण और ट्रेडिंग व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है। यदि यह प्रणाली सफल रहती है, तो भारतीय शेयर बाजार में पारदर्शिता और निवेशकों का भरोसा दोनों मजबूत हो सकते हैं।

फिलहाल एनएसई ने साफ कर दिया है कि निफ्टी के क्लोजिंग प्राइस में दिखाई दिया बड़ा अंतर किसी तकनीकी गड़बड़ी या अचानक बाजार उछाल का परिणाम नहीं, बल्कि Closing Auction Session के तहत अपनाई गई नई मूल्य खोज प्रक्रिया का स्वाभाविक प्रभाव था।

 

 

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