निर्जला एकादशी का व्रत सबसे कठिन माना जाता है। क्या इस दिन फल खा सकते हैं? जानें इस महाव्रत के सख्त नियम, महत्व और व्रत खोलने की सही विधि।
हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का अत्यंत विशेष महत्व है। एक वर्ष में कुल 24 एकादशियाँ आती हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट फल और महत्व है। परंतु, इन सभी में ‘निर्जला एकादशी’ को सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली यह तिथि अन्य सभी एकादशियों के मुकाबले सबसे अधिक कठिन और प्रभावशाली मानी जाती है। इसे ‘महाव्रत’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार, जो भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ इस दिन बिना अन्न और जल के उपवास रखता है, उसे वर्ष भर की सभी 24 एकादशियों का पुण्य फल स्वतः ही प्राप्त हो जाता है।
निर्जला एकादशी: कठिन नियमों का पालन
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ‘निर्जला’ का अर्थ है—जल के बिना। इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता और कठिन तपस्या यही है कि इसमें भक्त को पूरा दिन और पूरी रात बिना एक घूंट जल और बिना अन्न के व्यतीत करना होता है। यह व्रत आत्म-संयम, संकल्प और भगवान विष्णु के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक है। महाभारत काल में पांडु पुत्र भीम ने भी इस व्रत को धारण किया था, जिसके कारण इसे ‘भीमसेनी एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है।
व्रत के दौरान मन में अक्सर यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि क्या अन्य एकादशियों की तरह इस दिन भी फलों का सेवन किया जा सकता है? चूँकि सामान्य एकादशी व्रतों में हम फलाहार (दूध, फल, मेवे) का सेवन करते हैं, इसलिए यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि क्या निर्जला एकादशी में भी तरबूज, खरबूज, लीची या अन्य रसीले फलों को ग्रहण करना उचित है?
क्या निर्जला एकादशी में फलों का सेवन वर्जित है?
ज्योतिष शास्त्र और पुराणों के स्पष्ट निर्देशों के अनुसार, निर्जला एकादशी का व्रत ‘निर्जल’ और ‘निराहार’ ही रखा जाता है। इस व्रत की परिभाषा में ही यह निहित है कि इसमें अन्न और जल का त्याग करना अनिवार्य है। अतः, इस दिन किसी भी प्रकार के फल, चाहे वह तरबूज हो, खरबूज हो, लीची हो या कोई अन्य रसीला फल, का सेवन करना वर्जित है।
इस दिन जल तक का त्याग करने का विधान है, तो ऐसे में फलों का सेवन, जिसमें प्राकृतिक रूप से जल की मात्रा अधिक होती है, व्रत के संकल्प के विरुद्ध माना जाएगा। यदि आप फलों का सेवन करते हैं, तो वह निर्जला एकादशी नहीं, बल्कि एक सामान्य एकादशी का व्रत कहलाएगा। अतः, यदि आपने पूर्ण ‘निर्जला’ संकल्प लिया है, तो आपको सूर्यास्त के बाद भी अगले दिन सूर्योदय तक किसी भी प्रकार के खाद्य पदार्थ या पेय का सेवन नहीं करना चाहिए।
व्रत तोड़ने का सही विधान
निर्जला एकादशी का व्रत अगले दिन द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देने और भोजन कराने के बाद ही तोड़ा जाता है। व्रत पारण के समय सबसे पहले शुद्ध जल का आचमन करें और उसके बाद ही सात्विक भोजन ग्रहण करें। इस महाव्रत में नियमों की कठोरता ही इसके फल की तीव्रता को बढ़ाती है।
जो लोग स्वास्थ्य कारणों से पूरी तरह से जल त्यागने में असमर्थ हैं, वे केवल डॉक्टर की सलाह और शारीरिक क्षमता को ध्यान में रखते हुए ही इसका पालन करें। शास्त्र भी कहता है कि धर्म में शरीर की रक्षा करना भी एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है। लेकिन जो भक्त इस व्रत को पूरी निष्ठा और कठोर नियमों के साथ पूर्ण करते हैं, उन्हें भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है और वे जीवन में सुख, शांति और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होते हैं।
अतः, निर्जला एकादशी के दिन केवल भगवान विष्णु के नाम का स्मरण, जप और ध्यान में समय व्यतीत करना चाहिए। फलों या अन्य किसी भी आहार के बारे में सोचने के बजाय, अपने मन को भक्ति के सागर में लीन रखना ही इस व्रत की वास्तविक सार्थकता है।