प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फेसबुक वीडियो हटाने के मामले में संसदीय समिति ने Meta से जवाब मांगा। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने मार्क जुकरबर्ग से व्यक्तिगत माफी की मांग की और Safe Harbour सुरक्षा हटाने की चेतावनी दी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फेसबुक वीडियो कुछ घंटों के लिए प्लेटफॉर्म से हटाए जाने का मामला अब संसद तक पहुंच गया है। सोमवार को सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) से संबंधित संसदीय स्थायी समिति की बैठक में सोशल मीडिया कंपनी Meta के अधिकारियों से इस मुद्दे पर कड़ी पूछताछ की गई। समिति के अध्यक्ष और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह बेहद गंभीर मामला है और Meta के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) मार्क जुकरबर्ग को व्यक्तिगत रूप से सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का वीडियो यदि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित नहीं है, तो यह केवल तकनीकी गलती नहीं बल्कि जवाबदेही का विषय है। बैठक के दौरान कई सांसदों ने Meta से लिखित स्पष्टीकरण भी मांगा और कंपनी को 10 दिनों के भीतर अपना पक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।
निशिकांत दुबे ने सुरक्षित संरक्षण (Safe Harbour) हटाने की दी चेतावनी
बैठक के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए निशिकांत दुबे ने कहा कि Meta ने स्वयं स्वीकार किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वीडियो रात करीब 12:30 बजे से सुबह 5 बजे तक फेसबुक से गायब रहा। उन्होंने कहा कि यदि मार्क जुकरबर्ग व्यक्तिगत रूप से माफी नहीं मांगते हैं तो Meta को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत मिलने वाले सेफ हार्बर (Safe Harbour) संरक्षण पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। यह प्रावधान सोशल मीडिया कंपनियों को उनके प्लेटफॉर्म पर तीसरे पक्ष द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए सीमित कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। दुबे का कहना था कि यदि कंपनियां भारत के कानूनों और सरकारी निर्देशों का पालन नहीं करतीं तो उन्हें यह कानूनी सुरक्षा मिलती रहना उचित नहीं होगा।
पहले भी विवादों में रहा है Meta, सांसदों ने उठाए पुराने मुद्दे
बैठक के दौरान निशिकांत दुबे ने आरोप लगाया कि यह पहली बार नहीं है जब Meta विवादों में आया हो। उन्होंने कहा कि वर्ष 2024 में भी मार्क जुकरबर्ग ने भारत के संसदीय चुनावों के परिणामों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं। उनके अनुसार Meta की कार्यप्रणाली पर पहले भी कई बार सवाल उठ चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी की मानसिकता भारत में अस्थिरता पैदा करने वाली प्रतीत होती है। हालांकि Meta की ओर से पहले इस घटना को तकनीकी त्रुटि बताते हुए खेद व्यक्त किया जा चुका है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने उस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना था। कंपनी ने कहा था कि वीडियो गलती से हट गया था और बाद में उसे पुनः बहाल कर दिया गया।
एल्गोरिद्म, डीपफेक और आपत्तिजनक कंटेंट पर भी उठे सवाल
संसदीय समिति की बैठक केवल प्रधानमंत्री का वीडियो हटने तक सीमित नहीं रही। सांसदों ने Meta के एल्गोरिद्म और कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम पर भी गंभीर सवाल उठाए। कई सदस्यों ने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों और महिलाओं से जुड़े यौन शोषण, अश्लीलता और अन्य आपत्तिजनक सामग्री कई बार लंबे समय तक उपलब्ध रहती है, जबकि वैध और सामान्य सामग्री को हटा दिया जाता है। सांसदों ने Meta अधिकारियों से पूछा कि जब प्लेटफॉर्म पर इतना आपत्तिजनक कंटेंट मौजूद रहता है तो आखिर प्रधानमंत्री का वीडियो हटाने का निर्णय किसने लिया और इसकी अंतिम जिम्मेदारी किसकी है। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े डीपफेक वीडियो की पहचान और उन्हें रोकने के लिए विकसित एल्गोरिद्म की क्षमता पर भी सवाल उठाए गए। समिति ने Meta से यह स्पष्ट करने को कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कंपनी क्या कदम उठाएगी।
विपक्ष ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी रखी अपनी राय
बैठक के दौरान विपक्षी सांसदों ने भी अपनी बात रखी। सूत्रों के अनुसार विपक्ष के कुछ सदस्यों ने कहा कि लोकतंत्र में सोशल मीडिया पर असहमति (Dissent) के लिए पर्याप्त स्थान होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की आलोचना करने वाली हर सामग्री को राष्ट्रविरोधी नहीं माना जा सकता। विपक्ष का मानना था कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। वहीं सत्ता पक्ष के सांसदों ने इस बात पर जोर दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर नियमों की अनदेखी नहीं की जा सकती और यदि किसी प्लेटफॉर्म की तकनीकी या नीतिगत विफलता से देश के प्रधानमंत्री का आधिकारिक संदेश ही हट जाए तो उसकी जवाबदेही तय होना जरूरी है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के नियमन पर हुई व्यापक चर्चा
संसदीय समिति की यह बैठक “सोशल और डिजिटल प्लेटफॉर्म तथा उनका नियमन” विषय पर आयोजित की गई थी। इसमें गृह सचिव गोविंद मोहन, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन, Meta, Google, X (पूर्व में Twitter), YouTube और Snapchat सहित कई प्रमुख डिजिटल कंपनियों के प्रतिनिधि उपस्थित हुए। बैठक में भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही, एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता, कंटेंट मॉडरेशन, डीपफेक, फेक न्यूज और डिजिटल सुरक्षा जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। सूत्रों के अनुसार Meta अधिकारियों ने समिति के समक्ष घटना पर खेद व्यक्त करते हुए माफी मांगने की इच्छा जताई, लेकिन कई सांसदों ने स्पष्ट किया कि केवल माफी पर्याप्त नहीं है। उनका कहना था कि इस मामले में जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर कानूनी कार्रवाई भी की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म द्वारा ऐसी गंभीर चूक दोबारा न हो।