दिग्गज फिल्म निर्माता महेश भट्ट ने निर्देशन से संन्यास की पुष्टि की। ‘अर्थ’ और ‘सारांश’ जैसी फिल्मों के निर्माता ने साझा की अपनी राय।
दिग्गज फिल्म निर्माता महेश भट्ट ने हाल ही में पुष्टि की है कि वे अब भविष्य में किसी फीचर फिल्म का निर्देशन नहीं करेंगे। चार दशकों से अधिक के अपने शानदार करियर में, महेश भट्ट ने बॉलीवुड को ऐसी फिल्में दी हैं जो न केवल व्यावसायिक रूप से सफल रहीं, बल्कि गहराई से मानवीय संवेदनाओं को छूती थीं। एक हालिया साक्षात्कार में भट्ट ने स्पष्ट किया कि वे फिल्में और थिएटर नाटकों का निर्माण करना जारी रखेंगे, लेकिन निर्देशन की कुर्सी पर अब वापस नहीं लौटेंगे। उनके इस निर्णय ने भारतीय सिनेमा जगत में एक महत्वपूर्ण चर्चा को जन्म दिया है।
‘पूर्वनिर्धारित सामग्री’ और कलाकार की भूमिका
निर्देशन से संन्यास के अपने फैसले के पीछे का कारण बताते हुए महेश भट्ट ने आज के दौर की फिल्म निर्माण प्रक्रिया पर कटाक्ष किया। उनका मानना है कि आज के समय में कंटेंट (सामग्री) ‘पूर्वनिर्धारित’ (pre-decided) हो गई है। भट्ट कहते हैं, “जब आपको चीजें पहले से तय डिजाइनों के अनुसार बनाने के लिए मजबूर किया जाता है, तो एक कलाकार की भूमिका क्या रह जाती है?” उनके अनुसार, आज के दौर के एल्गोरिदम और प्लेटफॉर्म्स केवल संख्याओं (numbers) के पीछे भाग रहे हैं, जो फिल्म निर्माताओं को एक निश्चित ‘टेम्पलेट’ में फिट होने के लिए मजबूर करते हैं। उन्होंने इसे ‘मासीफिकेशन’ (massification) कहा, जहाँ व्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता सिमटती जा रही है। भट्ट के लिए, निर्देशन अब वह जीवंत प्रक्रिया नहीं रही, जिसे वे दशकों से महसूस करते आए थे।
विद्रोह और नई कहानियों की तलाश
भट्ट का मानना है कि भारतीय सिनेमा पूरी तरह से एक निराशाजनक दौर में नहीं फंसा है। उन्होंने इम्तियाज अली की हालिया रचना ‘मैं वापस आऊंगा’ की प्रशंसा करते हुए इसे ‘विद्रोह का क्षण’ करार दिया। उन्होंने कहा कि भले ही रात कितनी भी काली क्यों न हो, हमेशा ऐसे विद्रोही और साहसी कहानीकार पैदा होते रहेंगे जो लीक से हटकर नई पटकथाएं लिखेंगे। भट्ट के अनुसार, कहानी सुनाना मानव जाति के लिए जीवनदायिनी है और हमेशा ऐसे लोग सामने आएंगे जो थोपी गई अनुरूपता (conformity) को तोड़ेंगे। उन्होंने एक ऐसे ‘साहसी व्यक्ति’ की उम्मीद जताई है जो भविष्य में एक नए ‘पाइड पाइपर’ (Pied Piper) की तरह आएगा और दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करेगा।
1974 से 2020 तक का सफर: उतार-चढ़ाव भरी यात्रा
महेश भट्ट का निर्देशन का सफर 1974 में ‘मंजिलें और भी हैं’ के साथ शुरू हुआ था। शुरुआती वर्षों में उन्हें बॉक्स ऑफिस पर कई असफलताओं का सामना करना पड़ा। हालांकि, 1980 के दशक की शुरुआत में आई फिल्म ‘अर्थ’ (1982) उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। यह फिल्म आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे बेहतरीन रिलेशनशिप ड्रामा में से एक मानी जाती है। इसके बाद उन्होंने ‘सारांश’ (1984) जैसी कालजयी फिल्म दी, जिसने अनुपम खेर को एक अभिनेता के रूप में स्थापित किया। 90 के दशक में ‘सड़क’, ‘सर’, ‘तमन्ना’ और ‘डुप्लीकेट’ जैसी फिल्मों के साथ उन्होंने अपनी रचनात्मकता का लोहा मनवाया। हालांकि उन्होंने 1999 में ‘कारतूस’ के बाद भी निर्देशन से दूरी बना ली थी, लेकिन 2020 में ‘सड़क 2’ के साथ उन्होंने एक संक्षिप्त वापसी की थी। 50 से अधिक फिल्मों का निर्देशन करने के बाद, भट्ट का यह मानना कि अब उनके लिए निर्देशन का समय बीत चुका है, उनके सिनेमाई दृष्टिकोण की परिपक्वता को दर्शाता है।
विरासत और भविष्य की ओर नजर
भट्ट अब अपनी ऊर्जा को निर्माण (production) और थिएटर की ओर केंद्रित करना चाहते हैं। उनके लिए, फिल्मों के बारे में जुनून के साथ बात करना अब निर्देशन करने से कहीं अधिक संतोषजनक है। भले ही वे अब कैमरे के पीछे से सीधे निर्देशन नहीं करेंगे, लेकिन उनकी फिल्में और उनके विचार भारतीय सिनेमा की दिशा को प्रभावित करते रहेंगे। महेश भट्ट का संन्यास केवल एक निर्देशक का करियर अंत नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे युग का समापन है जिसने भारतीय सिनेमा को ‘पर्सनल सिनेमा’ (personal cinema) की नई पहचान दी। वे आज भी मानते हैं कि हर दौर में दर्शकों के अंदर कुछ संवेदनशील और दर्दनाक देखने की प्यास होती है, जो उनके जीवन से जुड़ी हो। और यही वह प्यास है, जो आने वाले नए कहानीकारों को प्रेरित करती रहेगी। महेश भट्ट का यह कदम निश्चित रूप से एक कलाकार के अपनी कला के प्रति ईमानदारी का प्रतीक है, जो यह बखूबी जानता है कि कब अपने अध्याय को समाप्त करके दूसरों के लिए रास्ता बनाना चाहिए।