मद्रास हाई कोर्ट ने करूर भगदड़ के पीड़ितों को दया के आधार पर सरकारी नौकरी देने का तमिलनाडु सरकार का आदेश रद्द कर दिया है। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन बताया।
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने सोमवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत करूर भगदड़ की घटना में मारे गए लोगों के परिजनों को ‘अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी’ (Compassionate Appointment) दी जा रही थी। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की प्रशासनिक शक्तियां असीमित नहीं हैं और उनका प्रयोग संविधान के दायरे में रहकर ही किया जाना चाहिए।
न्यायालय ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि इस प्रकार की नियुक्तियों की अनुमति दी जाती है, तो भविष्य में ऐसी अनुकंपा नियुक्तियों की मांग की एक नई बाढ़ आ जाएगी, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था और न्यायसंगत प्रक्रिया प्रभावित होगी।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन: कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. शक्तिवेल की खंडपीठ (Division Bench) ने इस मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार के आदेश को असंवैधानिक करार दिया। अदालत ने अपने फैसले में निम्नलिखित प्रमुख बिंदु रेखांकित किए:
- समानता का अधिकार: अदालत ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता) का सीधा उल्लंघन करता है।
- लंबी प्रतीक्षा सूची का हवाला: बेंच ने टिप्पणी की कि राज्य के हर सरकारी विभाग में ऐसे सैकड़ों पात्र लोग मौजूद हैं, जो लंबे समय से अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं।
- नियमों की अनदेखी: पहले से प्रतीक्षा कर रहे लोगों के अधिकारों की अनदेखी करके भगदड़ के पीड़ितों को सीधी अनुकंपा नौकरी देना पूरी तरह से अनुचित है।
अदालत ने यह भी साफ किया कि भले ही राज्य सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत अपनी प्रशासनिक शक्तियों का हवाला दिया हो, लेकिन ये शक्तियां संवैधानिक सीमाओं से ऊपर नहीं हो सकतीं।
‘अनुग्रह राशि और नौकरी में अंतर’: अन्य हादसों का उदाहरण
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी दुखद दुर्घटना के बाद राहत और पुनर्वास की एक सीमा होती है। अदालत ने पटाखा फैक्ट्रियों में होने वाले विस्फोटों और गंभीर सड़क/मोटर हादसों का उदाहरण प्रस्तुत किया:
अदालत का तर्क: ऐसे कई हादसे होते हैं जहाँ सरकार या प्रशासन की लापरवाही के कारण लोगों की जान चली जाती है। लेकिन उन मामलों में पीड़ितों को केवल अनुग्रह राशि (Ex-gratia payment) या मुआवजा दिया जाता है, न कि अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी।
यदि करूर हादसे के पीड़ितों को नौकरी देने की छूट दी जाती, तो भविष्य में पटाखा हादसों, फैक्ट्री दुर्घटनाओं या अन्य त्रासदियों के पीड़ितों को भी अनुकंपा नौकरी देने का कानूनी रास्ता खुल जाता, जो किसी भी राज्य सरकार के लिए व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
करूर भगदड़ का घटनाक्रम और सीएम विजय द्वारा बांटे गए नियुक्ति पत्र
यह पूरा मामला पिछले साल तमिलनाडु के करूर में हुई एक दुखद घटना से जुड़ा हुआ है।
- 27 सितंबर 2025 की घटना: करूर में ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) पार्टी के प्रमुख थलापति विजय की एक विशाल रैली का आयोजन किया गया था।
- भीषण हादसा: रैली के दौरान अचानक मची भगदड़ में 41 लोगों की जान चली गई थी और 60 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
- सरकारी पहल: इस घटना के बाद, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने करूर का दौरा किया था और पीड़ित परिवारों से मुलाकात की थी। जुलाई की शुरुआत में सरकार ने मृतक परिवारों के 32 आश्रितों को सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र भी सौंपे थे, जिसे अब हाई कोर्ट ने असंवैधानिक मानते हुए निरस्त कर दिया है।
सरकार की आगे की रणनीति: सुप्रीम कोर्ट जाने की संभावना
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ के इस झटके के बाद तमिलनाडु सरकार की कानूनी रणनीति पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। सूत्रों के हवाले से खबर आई है कि राज्य सरकार हाई कोर्ट के इस फैसले से सहमत नहीं है और वह पीड़ित परिवारों को राहत दिलाने के लिए इस आदेश को जल्द ही उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में चुनौती देने की तैयारी कर रही है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शीर्ष अदालत इस संवैधानिक और प्रशासनिक मामले पर क्या रुख अपनाती है।