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अभिनेत्री कियारा आडवाणी ने बेटी सरायाह के लिए अपनी मॉडर्न पैरेंटिंग और डेटिंग एडवाइस शेयर की है। उन्होंने कहा कि वे बेटी पर सिर्फ एक को डेट करने या शादी का दबाव नहीं बनाएंगी।
रिश्ते, डेटिंग और शादी को लेकर समाज में कई तरह के पारंपरिक नियम और उम्मीदें जुड़ी होती हैं, खासकर जब बात बेटियों की परवरिश की हो। जब आप फिल्म इंडस्ट्री का एक बड़ा और जाना-माना चेहरा होते हैं, तो इन विषयों पर आपके विचार और भी अधिक मायने रखते हैं। मशहूर अभिनेत्री कियारा आडवाणी ने हाल ही में राज शमानी के लोकप्रिय पॉडकास्ट में शिरकत की और प्यार, शादी और परवरिश (Parenting) से जुड़े अपने व्यक्तिगत विचारों पर खुलकर बात की।
भारतीय समाज में रिश्तों को लेकर चली आ रही रूढ़िवादी सोच से बिल्कुल अलग हटकर, कियारा ने अपनी बेटी सरायाह (Saraayah) के बड़े होने पर उसे दी जाने वाली डेटिंग और लाइफ एडवाइस साझा की। आत्मनिर्भरता, भावनात्मक समझ और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की वकालत करते हुए कियारा ने जोर दिया कि एक मां के रूप में उनका एकमात्र लक्ष्य अपनी बेटी को एक भरपूर और बिना किसी सामाजिक दबाव के अपनी शर्तों पर जीने वाली जिंदगी देना है।
‘सिर्फ एक को डेट करना और शादी करना जरूरी नहीं’: पारंपरिक बंधनों से मुक्ति
पीढ़ियों से हमारे समाज में बेटियों को यही सिखाया जाता है कि उन्हें अपने जीवन की शुरुआत से ही एक स्थाई और अंतिम जीवनसाथी की तलाश करनी चाहिए। शादी से पहले अलग-अलग लोगों से मिलना या अपनी प्राथमिकताओं को समझना अक्सर सही नहीं माना जाता। कियारा आडवाणी ने इस सोच को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा कि वे नहीं चाहतीं कि उनकी बेटी इस दबाव में बड़ी हो कि उसका पहला रिश्ता ही उसके पूरे जीवन का फैसला करेगा।
पॉडकास्ट पर सरायाह के भविष्य और उसके रिश्तों के नजरिए पर बात करते हुए कियारा ने कहा:
“मैं चाहती हूँ कि वह एक बहुत ही संपूर्ण और भरपूर (Full Life) जिंदगी देखे। मैं नहीं चाहती कि वह कभी भी ऐसा महसूस करे कि उसे केवल एक ही व्यक्ति को डेट करना है या उसी से शादी करनी है।”
अपनी बेटी को एक ‘भरपूर जिंदगी’ जीने के लिए प्रोत्साहित करके, कियारा उस भावनात्मक विकास और परिपक्वता को रेखांकित कर रही हैं जो अलग-अलग लोगों से मिलने, उनके दृष्टिकोण को समझने और यह जानने से आती है कि वास्तव में आपकी खुशी किस चीज में है। कियारा का मानना है कि डेटिंग का मतलब सिर्फ शादी तक पहुंचना नहीं है, बल्कि यह खुद को तलाशने और अपनी पसंद-नापसंद को समझने का एक माध्यम भी है।
प्यार को लेकर खुद कियारा के नजरिए में आया बदलाव
कियारा द्वारा अपनी बेटी को दी गई यह सलाह इसलिए भी बेहद खास और व्यावहारिक लगती है क्योंकि उन्होंने इसमें अपने अतीत की नासमझी और सच्चाई को भी स्वीकार किया है। उन्होंने बेहद ईमानदारी से कबूल किया कि जब वे छोटी थीं, तो प्यार और रोमांस को लेकर उनका नजरिया बहुत ज्यादा आदर्शवादी और पारंपरिक था।
राज शमानी से बात करते हुए कियारा ने खुलासा किया, “मैंने अपनी जिंदगी में जिसे भी डेट किया, मुझे हमेशा यही लगता था कि मैं उसी से शादी करने जा रही हूँ।”
यह बेबाक स्वीकारोक्ति उस दौर को दर्शाती है जिससे हर युवा गुजरता है—यह मानना कि हर रोमांटिक रिश्ता तभी सफल माना जाएगा जब वह शादी के मंडप तक पहुंचेगा। हालांकि, समय, उम्र और अनुभवों के साथ इंसान का नजरिया बदलता है। अपने खुद के उदाहरण से कियारा ने बताया कि हालांकि उस समय की गंभीरता में एक मासूमियत थी, लेकिन वह इंसान को मानवीय तालमेल (Compatibility) की जटिलताओं को पूरी तरह समझने से रोक भी सकती है। उनकी यह सलाह उनके खुद के जीवन के अनुभवों और व्यावहारिक समझ से निकली है।
शादी मजबूरी नहीं, एक मर्जी है: बेटी के हर फैसले के साथ खड़ी मां
कियारा के इस पैरेंटिंग रोडमैप का सबसे प्रगतिशील और सराहनीय पहलू यह है कि वे शादी को जीवन का एक अनिवार्य पड़ाव नहीं, बल्कि पूरी तरह से एक व्यक्तिगत चुनाव (Choice) मानती हैं। आज भी हमारे समाज में एक उम्र के बाद शादी को ही किसी महिला के सफल और सेटल होने का एकमात्र पैमाना माना जाता है। कियारा स्पष्ट रूप से इस धारणा को अपनी बेटी के लिए तोड़ना चाहती हैं।
कियारा ने साफ किया कि सरायाह जिंदगी में जो भी रास्ता चुनेगी, एक मां के रूप में उनका समर्थन हमेशा बिना किसी शर्त के रहेगा। उन्होंने कहा कि सरायाह के निजी फैसलों पर किसी भी तरह की सामाजिक समय-सीमा या पाबंदी नहीं होनी चाहिए। अगर उनकी बेटी एक भव्य शादी करना चाहती है, या बिना किसी दिखावे के एक शांत रिश्ता चुनती है, या फिर बिना शादी के पूरी तरह आत्मनिर्भर और अकेली रहकर अपनी जिंदगी बिताना चाहती है, तो वे हर मोड़ पर उसके साथ मजबूती से खड़ी रहेंगी।
शादी को अनिवार्य जीवन उपलब्धियों की सूची से बाहर रखकर, कियारा अपनी बेटी को आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ा रही हैं। यह दृष्टिकोण आने वाली पीढ़ी को सिखाता है कि किसी भी महिला की कीमत, पूर्णता और खुशियां किसी मैरिज सर्टिफिकेट पर निर्भर नहीं करतीं।
आधुनिक पैरेंटिंग के लिए एक नई मिसाल
कियारा आडवाणी के ये विचार इस बात का प्रतीक हैं कि आज के आधुनिक माता-पिता अपनी बेटियों के पालन-पोषण, डेटिंग और उनके अधिकारों को लेकर कितने जागरूक और खुले विचारों के हो चुके हैं। ऐतिहासिक रूप से, भारतीय परिवारों में डेटिंग और रोमांस जैसे विषयों पर बात करना एक टैबू (वर्जित) माना जाता रहा है, जिससे बच्चों और माता-पिता के बीच एक बड़ी दूरी बन जाती थी। एक सार्वजनिक मंच पर इन विषयों पर खुलकर बात करके कियारा ने एक प्रगतिशील और बिना किसी जजमेंट (रूढ़िवादिता) वाली पैरेंटिंग की मिसाल पेश की है।
उनका यह दर्शन एक ऐसी बेटी की परवरिश करने पर केंद्रित है जो अपने फैसलों में आश्वस्त हो, भावनात्मक रूप से मजबूत हो और अपनी सीमाएं खुद तय कर सके। सरायाह के लिए कियारा का यह विजन सामाजिक अपेक्षाओं को पूरा करने के बजाय व्यक्तिगत संतुष्टि और मानसिक खुशी पर आधारित है, जो आज के समय की बेहद बड़ी जरूरत है।