3 घंटे में सोशल मीडिया पोस्ट हटाने के नियम पर अरविंद केजरीवाल का मोदी सरकार पर हमला, बोले- ‘Gen Z से डर गई सरकार’

3 घंटे में सोशल मीडिया पोस्ट हटाने के नियम पर अरविंद केजरीवाल का मोदी सरकार पर हमला, बोले- ‘Gen Z से डर गई सरकार’

 

सोशल मीडिया कंटेंट 3 घंटे में हटाने के नियम को लेकर अरविंद केजरीवाल ने मोदी सरकार पर निशाना साधा। बोले- जनता की आवाज दबाने से गुस्सा और बढ़ेगा।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट हटाने को लेकर केंद्र सरकार के नए नियमों पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा है। केजरीवाल ने आरोप लगाया कि सरकार युवाओं और खासकर Gen Z की आवाज से डर गई है और इसी वजह से सोशल मीडिया पर नियंत्रण बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जनता की आवाज को दबाने की कोशिश जितनी अधिक होगी, लोगों में सरकार के खिलाफ गुस्सा उतना ही बढ़ेगा।

हालांकि, इस मामले में नियम की वास्तविक स्थिति यह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और अन्य इंटरमीडियरी को कुछ श्रेणी के गैरकानूनी या हानिकारक कंटेंट के खिलाफ कार्रवाई के लिए तीन घंटे की समयसीमा का पालन करना होगा। यह प्रावधान वैध सरकारी निर्देश, सक्षम अदालत के आदेश या संबंधित सरकारी एजेंसी की उचित सूचना मिलने के बाद लागू होता है।

क्या है सोशल मीडिया पर 3 घंटे वाला नया नियम?

भारत सरकार ने 2026 में IT Rules में बदलाव करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए कुछ गैरकानूनी कंटेंट हटाने की समयसीमा को काफी कम कर दिया है। पहले कुछ मामलों में प्लेटफॉर्म्स को कंटेंट हटाने के लिए अधिक समय मिलता था, लेकिन नए प्रावधानों के तहत निर्धारित परिस्थितियों में यह समयसीमा घटाकर तीन घंटे कर दी गई है।

सरकार का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर गैरकानूनी और नुकसान पहुंचाने वाले कंटेंट को तेजी से हटाना जरूरी है। खासकर AI-generated content, deepfake, impersonation और अन्य खतरनाक सिंथेटिक कंटेंट के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए सरकार ने प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी बढ़ाई है।

हर पोस्ट को तीन घंटे में हटाना जरूरी नहीं

इस नियम को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। सरकार के आधिकारिक स्पष्टीकरण के मुताबिक तीन घंटे की समयसीमा हर सोशल मीडिया पोस्ट पर लागू नहीं होती। यह उन मामलों से जुड़ी है जहां कंटेंट गैरकानूनी है और प्लेटफॉर्म को सक्षम अदालत के आदेश या सरकार/उसकी अधिकृत एजेंसी की उचित सूचना प्राप्त होती है।

यानी किसी व्यक्ति की सामान्य सोशल मीडिया पोस्ट को केवल इसलिए तीन घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य नहीं है क्योंकि सरकार उसे पसंद नहीं करती। नियम का उद्देश्य कानून का उल्लंघन करने वाले और निर्धारित श्रेणियों में आने वाले कंटेंट पर तेज कार्रवाई सुनिश्चित करना है।

केजरीवाल ने Gen Z को लेकर साधा निशाना

इसी नियम को लेकर अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर राजनीतिक हमला बोला है। केजरीवाल ने कहा कि Gen Z आंदोलन के बाद मोदी सरकार में डर का माहौल है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सोशल मीडिया पर युवाओं और आम लोगों की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है।

केजरीवाल का कहना है कि सरकार जितना लोगों की आवाज दबाने की कोशिश करेगी, उतना ही जनता का गुस्सा बढ़ेगा। उनके बयान को हालिया युवा आंदोलनों और सोशल मीडिया पर बढ़ती राजनीतिक सक्रियता के संदर्भ में देखा जा रहा है।

Gen Z आंदोलन के बाद सोशल मीडिया पर बढ़ी राजनीतिक हलचल

हाल के दिनों में भारत में Gen Z से जुड़े युवा आंदोलनों ने राजनीतिक चर्चा को प्रभावित किया है। युवाओं के बीच रोजगार, शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे मुद्दों को लेकर सोशल मीडिया पर काफी सक्रियता देखने को मिली है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, इन घटनाक्रमों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी युवाओं तक पहुंच बनाने के लिए Instagram और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अपनी सोशल मीडिया रणनीति को अधिक युवा-केंद्रित किया है।

ऐसे माहौल में सोशल मीडिया कंटेंट को लेकर सरकार की नई व्यवस्था ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। विपक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नजरिए से देख रहा है, जबकि सरकार इसे डिजिटल सुरक्षा और गैरकानूनी कंटेंट पर तेजी से कार्रवाई की जरूरत से जोड़ रही है।

सरकार का तर्क- डिजिटल प्लेटफॉर्म को सुरक्षित बनाना जरूरी

केंद्र सरकार का कहना है कि सोशल मीडिया पर AI और सिंथेटिक कंटेंट के बढ़ते इस्तेमाल से कई नई चुनौतियां पैदा हुई हैं। डीपफेक वीडियो, फर्जी ऑडियो, किसी व्यक्ति की पहचान का गलत इस्तेमाल और अन्य भ्रामक सामग्री तेजी से फैल सकती है। ऐसे कंटेंट से किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

इसी वजह से सरकार ने AI-generated और synthetic content की पहचान तथा लेबलिंग को लेकर भी प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी बढ़ाई है। नए नियमों में ऐसे कंटेंट की स्पष्ट पहचान और निर्धारित परिस्थितियों में तेजी से कार्रवाई पर जोर दिया गया है।

अभिव्यक्ति की आजादी बनाम डिजिटल सुरक्षा की बहस

तीन घंटे की समयसीमा ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल सुरक्षा के बीच संतुलन की बहस को सामने ला दिया है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि गैरकानूनी और नुकसान पहुंचाने वाले कंटेंट पर तेजी से कार्रवाई हो, लेकिन वैध राजनीतिक आलोचना, पत्रकारिता और आम नागरिकों की अभिव्यक्ति प्रभावित न हो।

वहीं विपक्ष का तर्क है कि सरकार को कंटेंट हटाने की शक्तियों के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। इसी राजनीतिक बहस के बीच केजरीवाल का बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने मोदी सरकार पर Gen Z और जनता की आवाज दबाने का आरोप लगाया है।

आगे भी जारी रह सकती है राजनीतिक तकरार

सोशल मीडिया कंटेंट को लेकर नए IT नियम आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बने रह सकते हैं। एक तरफ सरकार ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर गैरकानूनी, फर्जी और हानिकारक कंटेंट को तेजी से नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है, वहीं विपक्ष इन प्रावधानों के संभावित दुरुपयोग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल उठा रहा है।

फिलहाल तीन घंटे की समयसीमा को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि यह हर सोशल मीडिया पोस्ट को हटाने का सामान्य आदेश नहीं, बल्कि निर्धारित कानूनी परिस्थितियों में गैरकानूनी कंटेंट पर तेज कार्रवाई से संबंधित प्रावधान है। इसी मुद्दे को लेकर अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए इसे Gen Z की आवाज को दबाने की कोशिश बताया है।

 

 

 

 

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