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कर्नाटक के कोडागु जिले के दुबारे एलीफेंट कैंप में दो हाथियों की लड़ाई के बीच आने से चेन्नई की एक महिला पर्यटक की दर्दनाक मौत हो गई। जानें इस हादसे और वन्यजीव शिविरों की सुरक्षा से जुड़ी पूरी खबर।
वन्यजीवों को करीब से देखने का रोमांच कभी-कभी कितना जानलेवा साबित हो सकता है, इसका एक बेहद दुखद और झकझोर देने वाला उदाहरण कर्नाटक से सामने आया है। कर्नाटक के खूबसूरत कोडागु (Kodagu) जिले में स्थित एक प्रसिद्ध वन्यजीव शिविर में दो हाथियों के बीच अचानक भड़की लड़ाई के दौरान एक महिला पर्यटक की कुचलकर मौत हो गई। इस रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसे ने एक बार फिर कैप्टिव सेटिंग्स (बाड़े या शिविरों में इंसानी देखरेख में रहने वाले) और प्रशिक्षित जानवरों के आसपास रहने के खतरों और उनके बेहद करीब जाने की मानवीय भूल को उजागर कर दिया है।
यह घटना कर्नाटक के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक, दुबारे एलीफेंट कैंप (Dubare Elephant Camp) में घटित हुई। यहाँ रोजाना सैकड़ों की संख्या में देश-विदेश से पर्यटक हाथियों की गतिविधियों को देखने और उनके साथ समय बिताने आते हैं, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि आनंद और उत्साह का यह सफर एक परिवार के लिए जिंदगी भर का मातम बन जाएगा।
कौन थी पीड़िता और कैसे हुआ यह हादसा?
इस दर्दनाक हादसे की शिकार हुई महिला पर्यटक की पहचान 33 वर्षीय ज्यूनेश (Jyunesh) के रूप में हुई है, जो तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई की रहने वाली थीं। ज्यूनेश अपने परिवार या दोस्तों के साथ कोडागु जिले की वादियों और वहाँ के प्रसिद्ध दुबारे एलीफेंट कैंप की सैर पर आई थीं।
घटना के समय, शिविर में मौजूद हाथियों को नदी के किनारे नहलाया जा रहा था। दुबारे कैंप में हाथियों का स्नान (Elephant Bathing) पर्यटकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण होता है, जहाँ लोग हाथियों को पानी में खेलते और नहाते हुए बेहद करीब से देखते हैं और तस्वीरें खींचते हैं। ज्यूनेश भी अन्य पर्यटकों की तरह नदी के किनारे खड़े होकर हाथियों को नहाते हुए देख रही थीं। इसी दौरान, वहां मौजूद दो हाथियों के बीच किसी बात को लेकर अचानक हिंसक लड़ाई शुरू हो गई। देखते ही देखते दोनों भारी-भरकम जीव एक-दूसरे पर हमला करने लगे। हाथियों की इस अचानक हुई भिड़ंत से वहां मौजूद पर्यटकों में भगदड़ मच गई। बदकिस्मती से, चेन्नई की ज्यूनेश खुद को बचाने की कोशिश में भागते हुए एक हाथी की चपेट में आ गईं और हाथी के पैरों तले कुचले जाने के कारण उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
दुबारे एलीफेंट कैंप: पर्यटकों और हाथियों का पसंदीदा ठिकाना
कावेरी नदी के किनारे स्थित दुबारे एलीफेंट कैंप को कर्नाटक वन विभाग और जंगल लॉजेस एंड रिसॉर्ट्स द्वारा संचालित किया जाता है। यह मूल रूप से हाथियों का एक प्रशिक्षण शिविर (Training Camp) है, जहाँ हाथियों को पालतू बनाने, उनकी देखभाल करने और उन्हें प्रशिक्षित करने का काम किया जाता है। यहाँ हाथियों को इंसानों के बीच रहने की आदत डाली जाती है, ताकि वे त्योहारों (जैसे मैसूर दशहरा) या जंगलों में गश्त के काम आ सकें।
चूंकि ये हाथी इंसानी इशारों को समझते हैं और पूरी तरह प्रशिक्षित होते हैं, इसलिए पर्यटकों को इनके बेहद करीब जाने, इन्हें खाना खिलाने और महावतों की देखरेख में इन्हें नहलाने की अनुमति दी जाती है। इसी भरोसे के कारण पर्यटक अक्सर यह भूल जाते हैं कि वे कितने भी शांत दिखें, आखिरकार हैं तो वे विशालकाय जंगली जीव ही।
प्रशिक्षित जानवर भी क्यों हो जाते हैं हिंसक?
इस हादसे ने वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यटकों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर वन विभाग की देखरेख में रहने वाले और महावतों द्वारा पूरी तरह नियंत्रित किए जाने वाले ये हाथी इतने हिंसक कैसे हो गए? वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे कई प्राकृतिक और मानसिक कारण हो सकते हैं:
- मस्त (Musth) की अवस्था: नर हाथियों में समय-समय पर ‘मस्त’ नाम की एक प्राकृतिक अवस्था आती है, जिसमें उनके शरीर में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्तर सामान्य से 60 गुना तक बढ़ जाता है। इस दौरान बेहद शांत रहने वाला हाथी भी अत्यधिक आक्रामक और हिंसक हो जाता है।
- आपसी वर्चस्व की लड़ाई: कैप्टिविटी (बाड़े) में रहने के बावजूद हाथियों के भीतर अपने झुंड या इलाके में वर्चस्व (Dominance) साबित करने की प्राकृतिक वृत्ति बची रहती है। भोजन, मादा हाथी या सिर्फ अपनी ताकत दिखाने के लिए दो नर हाथी आपस में भिड़ सकते हैं।
- पर्यटकों का दबाव और तनाव: लगातार इंसानों के बीच घिरे रहने, कैमरों के फ्लैश और शोर-शराबे के कारण ये संवेदनशील जानवर कभी-कभी मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं और अचानक अजीब व्यवहार करने लगते हैं।
सुरक्षा मानकों और गाइडलाइंस पर उठे गंभीर सवाल
कोडागु के दुबारे कैंप में हुई इस दुखद घटना के बाद स्थानीय प्रशासन और वन विभाग की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पर्यटकों का कहना है कि जब हाथियों को नहलाया जाता है या वे खुले में होते हैं, तो पर्यटकों और हाथियों के बीच एक सुरक्षित दूरी बनाए रखने के लिए कोई ठोस बैरिकेडिंग या पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं होते?
इस हादसे के बाद वन्यजीव प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि:
- वन्यजीव शिविरों में पर्यटकों के लिए ‘नो-गो जोन’ (जहाँ जाना सख्त मना हो) तय होना चाहिए।
- हाथियों के व्यवहार पर नजर रखने के लिए महावतों और डॉक्टरों की एक विशेष टीम को हर वक्त तैनात रहना चाहिए।
- यदि कोई हाथी तनाव या ‘मस्त’ के लक्षण दिखाता है, तो उसे तुरंत पर्यटकों की नजरों से दूर एकांत में ले जाया जाना चाहिए।
प्रकृति का सम्मान और सावधानी बेहद जरूरी
कर्नाटक का यह हादसा उन सभी पर्यटकों के लिए एक कड़ा सबक है जो वन्यजीव अभयारण्यों या हाथी शिविरों में जाकर जानवरों को केवल मनोरंजन का साधन समझ लेते हैं। हमें यह समझना होगा कि एक प्रशिक्षित जानवर भी अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों को पूरी तरह नहीं छोड़ता। प्रकृति और वन्यजीवों का आनंद हमेशा एक सुरक्षित दूरी से और उनके दायरे का सम्मान करते हुए ही लिया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी और मासूम को अपनी जान न गंवानी पड़े।