कर्नाटक आबकारी विभाग के बड़े अधिकारियों के ठिकानों पर ED की छापेमारी। 13.3 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त, रिश्वतखोरी और मनी लॉन्ड्रिंग के बड़े खुलासे।
कर्नाटक में आबकारी विभाग के भीतर चल रहे कथित भ्रष्टाचार के एक बड़े मामले ने राज्य की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई करते हुए बेंगलुरु, मैसूरु और बेलगावी सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में एक साथ छापेमारी की। यह कार्रवाई धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत की गई है, जिसका उद्देश्य विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के उस नेटवर्क को तोड़ना है, जो लंबे समय से राज्य के राजस्व तंत्र को खोखला कर रहा था।
भ्रष्टाचार का ‘सीक्रेट कैश बुक’ और संगठित रिश्वतखोरी का नेटवर्क
ED की बेंगलुरु टीम द्वारा 24 जून 2026 को की गई इस छापेमारी का आधार कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR थी। जांच के दौरान ED को जो साक्ष्य मिले हैं, वे चौंकाने वाले हैं। विभाग के भीतर रिश्वतखोरी का एक ऐसा व्यवस्थित नेटवर्क काम कर रहा था, जिसे देखकर जांच एजेंसियां भी हैरान हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, शराब की दुकानों के संचालन, लाइसेंस के नवीनीकरण (Renewal), दुकानों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने और नए लाइसेंस जारी करने के नाम पर अधिकारियों द्वारा मोटी रकम वसूली जा रही थी। यह केवल छुटपुट भ्रष्टाचार नहीं था, बल्कि एक संगठित ढांचा था जिसमें बिचौलियों की मदद से हर महीने एक ‘तय रकम’ अवैध रूप से वसूली जाती थी। इस पूरे काले कारोबार को ट्रैक करने के लिए एक ‘सीक्रेट कैश बुक’ का उपयोग किया जाता था, जिसे अब ED ने जब्त कर लिया है। यह डायरी इस भ्रष्टाचार के हर पन्ने को खोलने में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगी।
काले धन को सफेद करने का जटिल तंत्र
जांच में यह भी सामने आया है कि रिश्वत के इस पैसे का उपयोग केवल व्यक्तिगत विलासिता के लिए नहीं, बल्कि धन शोधन (Money Laundering) के लिए किया जा रहा था। आबकारी विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपने परिवार के सदस्यों और बेहद करीबियों के नाम पर शराब के लाइसेंस ले रखे थे।
इन अधिकारियों ने अपने रिश्तेदारों के जरिए कारोबार का साम्राज्य खड़ा किया और फिर अवैध रूप से कमाए गए धन को ‘वैध आय’ के रूप में दिखाने के लिए कागजी हेराफेरी की। छापेमारी के दौरान ED ने आबकारी विभाग के अधिकारी जगदीश नायक, के.एम. थम्मन्ना और वाई.डी. मंजूनाथ के आवासों और उनके सहयोगियों के ठिकानों पर तलाशी ली। इन ठिकानों से मिले दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि कैसे एक संगठित तरीके से काले धन को सफेद बनाया जा रहा था।
13.3 करोड़ रुपये की बरामदगी: कार्रवाई का बड़ा असर
ED की इस छापेमारी का सबसे बड़ा परिणाम बरामदगी के रूप में सामने आया है। एजेंसी ने वाई.डी. मंजूनाथ, उनके ड्राइवर, परिवार के सदस्यों और सहयोगियों के ठिकानों से लगभग 5.5 करोड़ रुपये नकद, 7.8 करोड़ रुपये के सोने के आभूषण और 3.3 लाख रुपये की विदेशी मुद्रा जब्त की है। कुल मिलाकर, इस कार्रवाई में अब तक 13.3 करोड़ रुपये की अवैध संपत्ति और नकदी जब्त की जा चुकी है।
यह बरामदगी इस बात का प्रमाण है कि सरकारी पद का उपयोग किस हद तक निजी मुनाफे के लिए किया जा रहा था। इन अधिकारियों के ठिकानों से मिले प्रॉपर्टी के कागजात और डिजिटल डिवाइस से आने वाले समय में और भी कई बड़े खुलासे होने की संभावना है।
प्रशासन पर सवाल और आगे की राह
यह घटना न केवल आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है, बल्कि सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ों को भी उजागर करती है। लोकायुक्त की FIR के बाद ED की इस PMLA जांच ने यह साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अब कानून का शिकंजा और कस गया है।
कर्नाटक में यह कार्रवाई एक संकेत है कि जनता के पैसे की लूट करने वाले किसी भी अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा। ED इस मामले की कड़ी से कड़ी जोड़ने में जुटी है। आने वाले दिनों में उन बिचौलियों और बड़े रसूखदारों के नाम भी सामने आ सकते हैं, जो इस पूरे सिंडिकेट को पर्दे के पीछे से संचालित कर रहे थे। राज्य सरकार के लिए अब यह एक चुनौती है कि वह अपने विभागों में पारदर्शिता लाए और ऐसे भ्रष्टाचारों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए, ताकि सरकारी तंत्र में जनता का भरोसा कायम रह सके।