अमेरिका-ईरान तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारतीय रुपया 95.50 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर गिर गया है। राष्ट्रपति ट्रंप के बयान ने बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है।
नई दिल्ली/मुंबई: वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और खाड़ी देशों में युद्ध के गहराते बादलों के बीच भारतीय रुपये की स्थिति लगातार नाजुक होती जा रही है। मंगलवार को शुरुआती कारोबारी सत्र में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.50 के अब तक के सबसे निचले स्तर (Record Low) पर पहुंच गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा बयानों और ईरान के साथ युद्ध की आहट ने मुद्रा बाजार में हड़कंप मचा दिया है, जिससे निवेशकों में भारी घबराहट देखी जा रही है।
ट्रंप के बयान से बाजार में दहशत: ‘लाइफ सपोर्ट’ पर सीजफायर
रुपये में आई इस भारी गिरावट की मुख्य वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह बयान है, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ चल रहे संघर्ष विराम (Ceasefire) को ‘लाइफ सपोर्ट’ पर बताया। ट्रंप के इस रुख ने साफ कर दिया है कि मध्य-पूर्व में शांति की उम्मीदें अब लगभग खत्म हो चुकी हैं और आने वाले दिनों में संघर्ष और भी हिंसक रूप ले सकता है। इस खबर के आते ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग तेजी से बढ़ी और रुपये जैसे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव गहरा गया।
कच्चे तेल में उबाल: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर मंडराया खतरा
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों का सीधा असर भारतीय रुपये पर पड़ता है। ट्रंप की टिप्पणियों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। सबसे बड़ी चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को लेकर है। यदि युद्ध की स्थिति में यह जलमार्ग लंबे समय के लिए बंद हो जाता है, तो वैश्विक तेल और गैस की आपूर्ति पूरी तरह ठप हो सकती है। इस आशंका ने तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है, जिससे भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है और रुपये की वैल्यू तेजी से गिर रही है।
डॉलर इंडेक्स 98 के पार: सुरक्षित निवेश की तलाश
जैसे-जैसे खाड़ी संकट गहरा रहा है, दुनिया भर के निवेशक जोखिम भरी संपत्तियों (जैसे भारतीय शेयर और रुपया) से पैसा निकालकर ‘सुरक्षित’ माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर में निवेश कर रहे हैं। इसी का परिणाम है कि डॉलर इंडेक्स (Dollar Index) एक बार फिर 98 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया है। डॉलर के इस मजबूत रुख ने न केवल रुपये बल्कि दुनिया की कई अन्य प्रमुख मुद्राओं को भी बैकफुट पर धकेल दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी भी डॉलर की मजबूती का एक प्रमुख कारण बनी हुई है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव और RBI की भूमिका
रुपये का 95.50 के स्तर तक गिरना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चेतावनी है। रुपये की कमजोरी से आयात (Import) महंगा हो जाएगा, जिसका सीधा असर घरेलू महंगाई पर पड़ेगा। विशेष रूप से पेट्रोल, डीजल और खाने के तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।
अब बाजार की निगाहें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पर टिकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय बैंक रुपये की गिरावट को थामने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर सकता है या ब्याज दरों में बदलाव को लेकर कड़े कदम उठा सकता है। हालांकि, मौजूदा वैश्विक संकट इतना बड़ा है कि केवल घरेलू स्तर के प्रयास रुपये को स्थिर करने के लिए पर्याप्त नहीं लग रहे हैं।