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इम्तियाज अली ने रणबीर कपूर और आलिया भट्ट के संघर्षों पर की बात। नेपोटिज्म की बहस और फिल्मी परिवारों के सितारों के दबाव पर दिया बड़ा बयान।
बॉलीवुड में ‘विशेषाधिकार’ (privilege) और ‘संघर्ष’ (struggle) की बहस एक ऐसी पहेली है जो कभी खत्म नहीं होती। हर कुछ महीनों में यह चर्चा किसी न किसी रूप में फिर से सतह पर आ जाती है। इस बार फिल्म निर्माता इम्तियाज अली ने इस बहस को एक नया और परिपक्व नजरिया दिया है। ‘ज़ूम’ के साथ एक साक्षात्कार में, इम्तियाज ने उन कलाकारों के बारे में बात की जो फिल्मी परिवारों से आते हैं। उन्होंने इस सच्चाई को नकारा नहीं कि उन्हें शुरुआती मौके आसानी से मिल सकते हैं, लेकिन उन्होंने यह भी तर्क दिया कि फिल्मी घरानों में पैदा होने वाले सितारों का मानसिक और पेशेवर संघर्ष बाहर से आने वाले कलाकारों से कहीं अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
रणबीर और आलिया: अपेक्षाओं का भारी बोझ
इम्तियाज अली ने विशेष रूप से रणबीर कपूर और आलिया भट्ट का उदाहरण देते हुए बताया कि इंडस्ट्री के भीतर पैदा होने वाले लोगों पर एक अलग तरह की ‘कठोरता’ (toughness) होती है। उनके अनुसार, इन सितारों के आसपास सफलता के इतने ऊंचे उदाहरण होते हैं कि उन्हें खुद को सफल साबित करने के लिए अपने पिता, चाचा और माता के साथ मुकाबला करना पड़ता है। इम्तियाज ने यहाँ तक कहा कि उनके जैसे बाहरी लोगों के लिए रास्ता शायद उनसे कम कठिन रहा है। उनका तर्क है कि फिल्मी माहौल में पले-बढ़े कलाकारों के लिए अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाना और अपनी पिछली पीढ़ियों की उपलब्धियों को पार करना एक मानसिक लड़ाई जैसा है। यह एक ऐसी चुनौती है जिसे अक्सर बाहरी लोग या दर्शक नहीं देख पाते।
प्रतिभा ही नेपोटिज्म की बहस को खत्म करती है
इम्तियाज अली का स्पष्ट मानना है कि अंततः ‘प्रतिभा’ (talent) ही वह एकमात्र कारक है जो जनता की धारणा को बदलती है। उन्होंने कहा कि रणबीर कपूर और आलिया भट्ट जैसे कलाकार इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि लेबल (जैसे ‘नेपो किड’) लंबे समय तक टिक नहीं सकते। रणबीर की अभिनय क्षमता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता, और आलिया भट्ट का प्रदर्शन इतना प्रभावशाली है कि दर्शक इस बात की शिकायत नहीं करते कि उन्हें रोल क्यों मिला, बल्कि वे चाहते हैं कि उन्हें और अधिक भूमिकाएं मिलें। इम्तियाज के अनुसार, ये कलाकार इस मुकाम तक पहुँचने के लिए केवल विशेषाधिकार पर निर्भर नहीं रहे, बल्कि उन्होंने अपनी प्रतिभा को साबित करके इस स्थान को ‘अर्जित’ (earn) किया है। उन्होंने जोर दिया कि फिल्मी पृष्ठभूमि वाले लोगों को खुद को बार-बार और अधिक मेहनत से साबित करना पड़ता है।
एक लंबा रचनात्मक संबंध
इम्तियाज अली का आलिया और रणबीर के साथ एक गहरा रचनात्मक इतिहास रहा है। आलिया भट्ट का शुरुआती करियर ‘हाईवे’ जैसी फिल्म से एक बड़ा मोड़ ले पाया, जो आज भी उनके अभिनय का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है। इसी तरह, रणबीर कपूर के साथ इम्तियाज का काम ‘रॉकस्टार’ और ‘तमाशा’ जैसी फिल्मों में देखने को मिला। हालांकि शुरुआत में ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर मिश्रित प्रतिक्रिया का सामना कर रही थीं, लेकिन समय के साथ दर्शकों ने इन फिल्मों की गहराई और रणबीर के अभिनय को काफी सराहा। यह रचनात्मक जुड़ाव इम्तियाज को इन कलाकारों के निजी और पेशेवर संघर्षों को करीब से समझने की क्षमता देता है।
आगामी प्रोजेक्ट्स और फिल्मी गलियारे
वर्क फ्रंट की बात करें तो इम्तियाज अली अपनी अगली फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ की रिलीज के लिए तैयार हैं। यह फिल्म विभाजन-युग (Partition-era) के प्रवास के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें दिलजीत दोसांझ, वेदांग रैना, शरवरी और नसीरुद्दीन शाह मुख्य भूमिकाओं में हैं। वहीं, रणबीर कपूर वर्तमान में नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही महाकाव्य फिल्म ‘रामायण’ की शूटिंग में व्यस्त हैं, जिसमें वे भगवान राम की भूमिका निभाएंगे। इसके अलावा, आलिया भट्ट यशराज फिल्म्स के स्पाई यूनिवर्स की अगली किस्त ‘अल्फा’ में नजर आएंगी।
क्या labels मायने रखते हैं?
इम्तियाज अली का यह बयान बॉलीवुड की नेपोटिज्म वाली बहस में संतुलन लाने की एक कोशिश है। उनका संदेश साफ है: उद्योग में कोई भी अपनी विरासत के दम पर लंबे समय तक नहीं टिक सकता। चाहे वह बाहर से आने वाला कलाकार हो या स्टार किड, अंततः पर्दे पर उनका प्रदर्शन ही तय करता है कि वे दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बना पाएंगे या नहीं। यह बहस भले ही जारी रहे, लेकिन इन सितारों की यात्रा यह साबित करती है कि कड़ी मेहनत और निरंतरता हर तरह के ‘लेबल्स’ को पीछे छोड़ने का माद्दा रखती है।