हूल दिवस पर 1855 के संथाल विद्रोह के नायकों सिद्धू-कान्हू और फूलो-झानो को नमन। जानिए कैसे उनके संघर्ष ने आदिवासी अधिकारों को मजबूती दी।
30 जून, 2026, हूल दिवस के अवसर पर भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 1855 के ऐतिहासिक संथाल हूल (विद्रोह) के अमर नायकों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। यह दिन न केवल भारतीय इतिहास के एक गौरवशाली अध्याय को याद करने का अवसर है, बल्कि यह आदिवासी समाज की अस्मिता, स्वाभिमान और साहस का प्रतीक भी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपने संदेश में राष्ट्रपति ने कहा कि सिद्धू-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो जैसे महान क्रांतिकारियों का बलिदान और उनकी वीरता देश के हर नागरिक के लिए निरंतर प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
1855 का संथाल हूल: औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध पहली हुंकार
संथाल विद्रोह, जिसे ‘संथाल हूल’ के नाम से जाना जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सबसे प्रारंभिक और संगठित आंदोलनों में से एक है। यह विद्रोह 1857 के सिपाही विद्रोह से दो वर्ष पूर्व ही औपनिवेशिक शासन की नींव हिलाने वाला एक बड़ा जन-आंदोलन था। 30 जून 1855 को, वर्तमान झारखंड के भोगनाडीह में 10,000 से अधिक संथाल एकत्र हुए थे। इस ऐतिहासिक सभा में उन्होंने ब्रिटिश दमनकारी नीतियों, जमींदारों के शोषण, अन्यायपूर्ण कराधान और जबरन श्रम के खिलाफ ‘आजादी’ का बिगुल फूँक दिया था। यह केवल एक विद्रोह नहीं था, बल्कि अपनी संस्कृति, भूमि और पहचान को बचाने के लिए छेड़ा गया एक पवित्र संघर्ष था।
नेतृत्व और नारी शक्ति का अद्भुत संगम
संथाल विद्रोह की सबसे बड़ी विशेषता इसका अद्वितीय नेतृत्व था। इस आंदोलन की कमान सिद्धू और कान्हू मुर्मू ने संभाली थी, जिन्होंने अपनी रणनीतिक सूझबूझ से हजारों आदिवासियों को एकजुट किया। उनके साथ ही चांद और भैरव ने सैन्य मोर्चे पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेष रूप से, इस विद्रोह में महिला शक्ति की भागीदारी अत्यंत प्रेरणादायक थी। फूलो और झानो मुर्मू जैसी वीरांगनाओं ने न केवल पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया, बल्कि उन्होंने महिलाओं की एक विशेष टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए औपनिवेशिक प्रशासन के विरुद्ध वीरता दिखाई। उनका यह साहस यह बताता है कि आदिवासी समाज में महिलाएं हमेशा से स्वतंत्रता और न्याय की रक्षा में अग्रणी रही हैं।
दमन और संघर्ष का दीर्घकालिक प्रभाव
यद्यपि ब्रिटिश प्रशासन ने अपनी सैन्य शक्ति का क्रूर प्रदर्शन करते हुए 1856 की शुरुआत तक इस विद्रोह को दबा दिया था, जिसमें हजारों आदिवासी शहीद हुए, लेकिन उनकी शहादत व्यर्थ नहीं गई। इस विद्रोह ने ब्रिटिश हुकूमत को आदिवासी क्षेत्रों में अपनी प्रशासनिक नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। इस संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम ‘संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1876’ (Santhal Parganas Tenancy Act) के रूप में सामने आया। इस कानून ने आदिवासी भूमि के गैर-आदिवासियों को हस्तांतरण पर रोक लगाई, जो आज भी आदिवासी समुदायों की भूमि अधिकारों की सुरक्षा का सबसे बड़ा ढाल बना हुआ है।
राष्ट्रपति मुर्मू का सफर: जनजातीय गौरव का प्रतीक
हूल दिवस के अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की यात्रा को एक प्रेरणादायक उदाहरण बताया। एक साधारण आदिवासी पृष्ठभूमि से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुँचने तक का उनका सफर यह दर्शाता है कि आज का भारत आदिवासी समाज के संघर्षों, गरिमा और उनके योगदान का किस प्रकार सम्मान करता है। राष्ट्रपति मुर्मू का सर्वोच्च पद पर आसीन होना उन लाखों आदिवासियों के लिए एक उम्मीद की किरण है, जो आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं।
शहादत से प्रेरणा
हूल दिवस हमें याद दिलाता है कि भारत की आजादी की लड़ाई में आदिवासी समुदायों का योगदान कितना निर्णायक रहा है। सिद्धू-कान्हू और फूलो-झानो जैसे नायकों ने जिस निडरता के साथ शोषणकारी व्यवस्था को चुनौती दी, वह आज के दौर में भी प्रासंगिक है। हूल दिवस केवल इतिहास के पन्नों को पलटने का दिन नहीं है, बल्कि यह उन मूल्यों को फिर से आत्मसात करने का दिन है जिनके लिए हमारे पूर्वजों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया। उनकी वीरता और बलिदान की गाथाएं आने वाली पीढ़ियों को न्याय और समानता के लिए खड़े होने का साहस प्रदान करती रहेंगी। संपूर्ण राष्ट्र आज इन अमर शहीदों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है और उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलकर एक सशक्त व समावेशी भारत के निर्माण का संकल्प लेता है।