गुजरात में कुपोषण पर सियासत: क्या केवल विज्ञापनों में सिमट कर रह गई है कुपोषण मुक्त गुजरात की मुहिम?

गुजरात में कुपोषण पर सियासत: क्या केवल विज्ञापनों में सिमट कर रह गई है कुपोषण मुक्त गुजरात की मुहिम?

 

गुजरात में कुपोषण के खिलाफ भाजपा सरकार के दावों पर आम आदमी पार्टी ने उठाए सवाल। जानें क्या है विज्ञापनों और जमीनी हकीकत का सच।

भारत में कुपोषण के खिलाफ जंग एक राष्ट्रीय प्राथमिकता है, लेकिन हाल के दिनों में गुजरात में इसको लेकर छिड़ी बहस ने नए राजनीतिक मोड़ ले लिए हैं। विपक्षी दल आम आदमी पार्टी (आप) ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि कुपोषण से निपटने के दावे केवल विज्ञापनों और प्रचार तक सीमित हैं। जमीनी हकीकत इन सरकारी दावों से कोसों दूर है, जहाँ आज भी बड़ी संख्या में बच्चे और महिलाएं कुपोषण की मार झेलने को मजबूर हैं।

विपक्ष का प्रहार: ‘विज्ञापन बनाम हकीकत’

आम आदमी पार्टी (आप) के अनुसार, भाजपा सरकार कुपोषण जैसे संवेदनशील मुद्दे को भी प्रचार के एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर रही है। आप का तर्क है कि भारी-भरकम विज्ञापनों के जरिए ‘कुपोषण मुक्त गुजरात’ का नैरेटिव तो गढ़ा जा रहा है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति में वह सुधार नहीं दिख रहा, जिसकी जरूरत है। पार्टी के अनुसार, आंगनवाड़ी केंद्रों में पोषण आहार की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव इस बात का प्रमाण है कि सरकारी नीतियां धरातल पर दम तोड़ रही हैं।

क्या सरकारी आंकड़े और जमीनी सच्चाई अलग हैं?

कुपोषण की समस्या को दूर करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। भाजपा सरकार अक्सर अपने आंकड़ों के माध्यम से यह दर्शाती है कि कुपोषण के मामलों में कमी आई है। हालांकि, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों का कहना है कि आधिकारिक आंकड़ों में हेरफेर या सही ढंग से मॉनिटरिंग न होने के कारण असली स्थिति सामने नहीं आ रही है। गुजरात जैसे विकसित राज्य में कुपोषण के आंकड़े सामने आना न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह उन वादों पर भी सवाल उठाता है जो पिछले कई वर्षों से किए जा रहे हैं।

कुपोषण के खिलाफ लड़ाई: एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता

कुपोषण केवल भोजन की कमी नहीं है, बल्कि यह स्वच्छता, स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य जागरूकता और आर्थिक स्थिति का मिला-जुला परिणाम है। भाजपा सरकार भले ही अपनी नीतियों को बेहतर बता रही हो, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकारी सहायता से यह समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए समुदाय स्तर पर सक्रिय भागीदारी, स्कूलों में पोषणयुक्त मिड-डे मील और माताओं के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। ‘आप’ का यह आरोप कि “भाजपा केवल विज्ञापनों में ही काम कर रही है”, सरकार के लिए एक आईना है कि उसे अपनी नीतियों की कार्यप्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

 राजनीति से ऊपर उठकर समाधान की तलाश

कुपोषण जैसी समस्या पर राजनीति होना दुखद है, क्योंकि अंततः इसका खामियाजा राज्य के मासूमों को भुगतना पड़ता है। भाजपा सरकार पर ‘आप’ के आरोपों के बाद अब यह जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की बनती है कि वह केवल दावों के बजाय पारदर्शी और ठोस कदम उठाए। गुजरात को वास्तव में कुपोषण मुक्त बनाने के लिए राजनीतिक विज्ञापनों से बाहर निकलकर, धरातल पर स्वास्थ्य और पोषण के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना होगा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार इस मुद्दे पर विपक्ष के सवालों का जवाब केवल जुबानी देती है या वास्तव में जमीनी स्तर पर कोई बदलाव दिखाई देता है।

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