विदेशी निवेशकों के लिए सरकार ने खत्म किया कैपिटल गेन्स टैक्स। आरबीआई ने डॉलर प्रवाह बढ़ाने के लिए किए कई बड़े ऐलान। पूरी खबर यहाँ पढ़ें।
भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक चुनौतियों से सुरक्षित रखने और विदेशी पूंजी के प्रवाह को गति देने के लिए केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक साथ बड़े नीतिगत बदलाव किए हैं। ईरान-अमेरिका संघर्ष के बाद वैश्विक बाजारों में आई अस्थिरता और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ गया था। इस स्थिति से निपटने और विदेशी निवेशकों का भरोसा बहाल करने के लिए सरकार ने सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) में निवेश को अधिक आकर्षक बना दिया है।
कैपिटल गेन्स टैक्स और विदहोल्डिंग टैक्स में राहत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक बड़ा निर्णय लेते हुए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश पर कैपिटल गेन्स टैक्स को पूरी तरह से समाप्त करने का फैसला किया है। यह बदलाव 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी हो गया है। अब तक, विदेशी निवेशक जो सूचीबद्ध बॉन्ड को 12 महीने से अधिक समय तक रखते थे, उन्हें 12.5 प्रतिशत का लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स देना पड़ता था। इस राहत से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के लिए भारत का डेट मार्केट अत्यधिक आकर्षक हो गया है।
इसके साथ ही, सरकार ने सरकारी बॉन्ड से प्राप्त ब्याज आय पर लगने वाले 20 प्रतिशत के विदहोल्डिंग टैक्स को भी हटा दिया है। यह एक दोहरा प्रोत्साहन है, जिससे विदेशी निवेशकों को निवेश पर मिलने वाले रिटर्न में सीधा इजाफा होगा। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह कदम न केवल विदेशी निवेश को आकर्षित करेगा, बल्कि भारत के सॉवरेन बॉन्ड की वैश्विक मांग को भी काफी बढ़ाएगा।
आरबीआई के कड़े और प्रभावी नीतिगत उपाय
आरबीआई ने विदेशी मुद्रा (डॉलर) के प्रवाह को बढ़ाने के लिए सात-सूत्रीय कार्ययोजना की घोषणा की है। रुपये की गिरती कीमतों को थामने और विदेशी मुद्रा भंडार को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से उठाए गए इन कदमों का विवरण इस प्रकार है:
फुली एक्सेसिबल रूट (FAR): सरकार ने 15, 30 और 40 वर्ष की अवधि वाले सभी नए सरकारी बॉन्ड्स को ‘फुली एक्सेसिबल रूट’ का हिस्सा बनाने का निर्णय लिया है। यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस श्रेणी के बॉन्ड तीन प्रमुख वैश्विक बॉन्ड इंडेक्स का हिस्सा हैं, जिससे वैश्विक पैसिव फंड्स का भारत की ओर रुख करना आसान हो जाएगा।
- निवेश सीमा को हटाना: अन्य सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश पर लगी सभी सीमाओं को खत्म कर दिया गया है।
- अनिवासी भारतीयों (NRI) के लिए सुविधा: अनिवासी भारतीयों और भारत के विदेशी नागरिकों (OCI) के लिए निवेश की सीमा न केवल बढ़ाई गई है, बल्कि इसे भारत के बाहर रहने वाले सभी व्यक्तिगत व्यक्तियों के लिए विस्तारित किया गया है।
- विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा: आरबीआई ने 30 सितंबर तक लगभग चार महीनों के लिए रियायती फॉरेक्स स्वैप (concessional forex swap) की सुविधा प्रदान करने का निर्णय लिया है।
- बाहरी वाणिज्यिक उधारी (ECB): सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) द्वारा बाहरी वाणिज्यिक उधारी को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष उपाय किए जाएंगे।
- हेजिंग लागत में छूट: आरबीआई ने बैंकों को 3 से 5 साल की अवधि की FCNRB जमा राशि जुटाने के लिए 30 सितंबर तक पूर्ण हेजिंग लागत (hedging cost) वहन करने की सुविधा दी है।
- निर्यात आय वसूली: निर्यात आय की वसूली के समय को बढ़ाकर नौ महीने कर दिया गया है, जिससे निर्यातकों को बड़ी राहत मिलेगी।
रुपये की स्थिरता और आर्थिक प्रभाव
फरवरी के अंत से शुरू हुए ईरान संघर्ष के कारण भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 5 प्रतिशत तक गिर चुका है। जून की शुरुआत में रुपया 95 के पार कारोबार कर रहा था। इन सरकारी और आरबीआई के संयुक्त उपायों का असर तुरंत दिखाई देने लगा है, जिससे रुपये में रिकवरी की उम्मीद जगी है। विदेशी निवेशकों के लिए टैक्स छूट और निवेश की शर्तों में ढील देने से भारत के डेट मार्केट में तरलता (liquidity) बढ़ेगी।
यह ‘मल्टी-प्रोंग्ड’ रणनीति न केवल डॉलर की कमी को पूरा करने में सहायक होगी, बल्कि वैश्विक निवेशकों को यह संदेश भी देगी कि भारत अपनी नीतियों में लचीलापन लाने और वैश्विक स्तर के अनुरूप सुधार करने में सक्षम है। कुल मिलाकर, यह एक रणनीतिक कदम है जो न केवल अल्पकालिक मुद्रा संकट को कम करेगा, बल्कि दीर्घकालिक रूप से भारत की ऋण बाजार संरचना को भी अधिक प्रतिस्पर्धी और समावेशी बनाएगा।