प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आपातकाल की 51वीं बरसी पर इसे संविधान पर सीधा हमला बताया। जानिए 1975 के उस काले अध्याय, नागरिक स्वतंत्रता के दमन और लोकतंत्र की रक्षा के संकल्प की पूरी कहानी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1975 में लगाए गए आपातकाल की 51वीं बरसी पर इसे भारतीय संविधान पर ‘सीधा हमला’ करार दिया है। 25 जून, 1975 का वह दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे काले पन्नों में से एक के रूप में दर्ज है। प्रधानमंत्री ने उन सभी लोगों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने उस दमनकारी दौर में लोकतंत्र की रक्षा के लिए अथक संघर्ष किया और अपने प्राणों की बाजी लगा दी।
आपातकाल: संविधान और नागरिक स्वतंत्रता का दमन
Today, we pay homage to all those who steadfastly defended democratic values during one of the darkest chapters in India’s history, the Emergency.
The Emergency was a direct assault on our Constitution. It witnessed the suspension of civil liberties, curbs on freedom of…
— Narendra Modi (@narendramodi) June 25, 2026
25 जून 1975 की रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने ‘आंतरिक अशांति’ का हवाला देते हुए अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की थी। यह घोषणा केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ पर सीधा प्रहार था। इस दौरान नागरिक स्वतंत्रता को पूरी तरह निलंबित कर दिया गया, अभिव्यक्ति की आजादी पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए और प्रेस को सेंसरशिप के दायरे में जकड़ दिया गया।
उस दौर में विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विचारकों को ‘मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट’ (MISA) जैसे कठोर कानूनों के तहत बिना किसी ठोस कारण के जेलों में डाल दिया गया। जयप्रकाश नारायण जैसे वरिष्ठ नेताओं को सलाखों के पीछे भेज दिया गया, जिन्होंने 1970 के दशक में कांग्रेस सरकार के खिलाफ ‘संपूर्ण क्रांति’ (बिहार आंदोलन) का नेतृत्व किया था। शाह आयोग की रिपोर्टों ने बाद में इस कालखंड की भयावहता को उजागर किया, जिसमें सामूहिक हिरासत, जबरन नसबंदी अभियान और प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंटने जैसे कृत्य सामने आए।
लोकतंत्र की रक्षा का साहस
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने एक्स (X) पोस्ट में उस समय के नागरिकों के साहस को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आपातकाल का दौर भारतीय इतिहास का सबसे अंधकारमय अध्याय होने के बावजूद, उन असंख्य नागरिकों के असाधारण साहस का गवाह बना, जिन्होंने चुप रहने से इनकार कर दिया। उन लोगों ने न केवल दमन के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि संविधान में निहित आदर्शों को भी जीवित रखा। वे लोग लोकतंत्र के सच्चे रक्षक थे जिन्होंने यह साबित किया कि भारत की जनता अपनी आजादी और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति कितनी सजग और समर्पित है।
संवैधानिक मूल्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता
आज 140 करोड़ भारतीयों के लिए हमारा संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह देश की आकांक्षाओं, अधिकारों और कर्तव्यों का मूर्त रूप है। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर राष्ट्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि हम सामूहिक रूप से संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए संकल्पित हैं। संविधान की भावना हमें यह सिखाती है कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व ही हमारे देश की नींव हैं।
पिछले वर्ष भारतीय जनता पार्टी ने आपातकाल की 50वीं बरसी को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में चिन्हित किया था, जिसका उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को उस दौर की गलतियों और लोकतंत्र के महत्व से अवगत कराना है। यह याद रखना अत्यंत आवश्यक है कि लोकतंत्र की रक्षा कोई एक बार का कार्य नहीं है, बल्कि यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
1975 का आपातकाल हमें चेतावनी देता है कि जब सत्ता अपनी सीमाओं को लांघती है और संस्थानों को कमजोर करती है, तो लोकतंत्र को कितना बड़ा खतरा हो सकता है। आज का भारत इन अनुभवों से सीख लेकर आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी का यह आह्वान कि हम एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जो न्याय और स्वतंत्रता के लिए सदैव प्रतिबद्ध रहेगा, आज की पीढ़ी के लिए एक नई दिशा प्रदान करता है। आपातकाल की बरसी पर हमें यह संकल्प दोहराना चाहिए कि भविष्य में कभी भी कोई ताकत हमारे देश के लोकतांत्रिक ढांचे को चुनौती देने का साहस न कर सके। हम संविधान की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहें, क्योंकि यही हमारे राष्ट्र की शक्ति और प्रगति का एकमात्र आधार है।