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नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई ‘देसी ब्लिंग’ वेब सीरीज का रिव्यू। जानिए दुबई में रहने वाले रईस भारतीयों की इस सीरीज में क्या है खास और क्यों हो रही है आलोचना।
नेटफ्लिक्स पर हाल ही में रिलीज हुई वेब सीरीज ‘देसी ब्लिंग’ (Desi Bling) इस समय चर्चा का विषय बनी हुई है। ‘दुबई ब्लिंग’ के भारतीय संस्करण के रूप में प्रस्तुत की गई यह 7 एपिसोड की सीरीज दुबई में रहने वाले कुछ बेहद रईस भारतीयों के जीवन को पर्दे पर उतारने का प्रयास करती है। जैसे ही यह शो 20 मई को स्ट्रीम होना शुरू हुआ, सोशल मीडिया समीक्षाओं से भर गया। करण कुंद्रा, तेजस्वी प्रकाश, रिजवान सजन, अदेल सजन, सना सजन, सतीश सनपाल, तबिंदा सनपाल और पामेला सेरेना जैसे नामचीन चेहरों से सजी यह सीरीज अपनी भव्यता और दिखावे के लिए दर्शकों के बीच उत्सुकता का केंद्र बनी हुई है।
दिखावे और वास्तविकता के बीच का बारीक अंतर
‘देसी ब्लिंग’ की सबसे बड़ी विशेषता (या कुछ के लिए खामी) इसका अत्यधिक ‘फ्लैशी’ और दिखावटीपन से भरा होना है। सीरीज में दुबई की आलीशान जिंदगी, महंगी कारों, डिजाइनर कपड़ों और पार्टियों का ऐसा ताना-बाना बुना गया है जो अक्सर वास्तविकता से दूर नजर आता है। सोशल मीडिया पर एक दर्शक ने बड़ी सटीक टिप्पणी की: “देसी ब्लिंग अपनी बनावटीपन के कारण अलग नजर आती है। अक्सर इसमें न तो मौलिकता दिखती है और न ही बुनियादी शिष्टाचार। यह उस तरह की दिखावटी फिजूलखर्ची है जो सुरुचिपूर्ण होने के बजाय नकली और भद्दी लगती है।” यह टिप्पणी उन दर्शकों के एक बड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जिन्हें लगता है कि शो में दिखाई गई जीवनशैली केवल चकाचौंध के लिए है, न कि किसी गहरी कहानी के लिए।
क्यों ‘बुरा होना भी है अच्छा’ (Bad is Good to Watch)?
अक्सर लोग ऐसी सीरीज को एक ‘गिल्टी प्लेजर’ (Guilty Pleasure) की तरह देखते हैं। भले ही शो की आलोचना की जा रही हो कि यह ‘फेक’ है या इसमें ‘बेसिक मैनर्स’ की कमी है, लेकिन फिर भी लोग इसे देख रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों? इसका जवाब ‘देसी ब्लिंग’ के उस मनोरंजन मूल्य में छिपा है जिसे ‘बैड टेलीविजन’ कहा जाता है। दर्शकों को यह देखने में एक अलग ही मजा आता है कि कैसे रईस लोग एक-दूसरे से मुकाबला करते हैं, कैसी फिजूलखर्ची करते हैं और कैसे ड्रामा पैदा करते हैं। यहाँ का ड्रामा उतना ही बेतुका है जितना कि यह मनोरंजक। दर्शकों के लिए यह एक ‘विंडो शॉपिंग’ की तरह है, जहाँ वे उन चीजों को देखते हैं जो आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं, भले ही वह दिखावा कितना भी बनावटी क्यों न लगे।
कलाकारों का प्रदर्शन और स्क्रीन प्रेजेंस
शो में करण कुंद्रा और तेजस्वी प्रकाश जैसे लोकप्रिय टीवी चेहरों की मौजूदगी इसे एक बड़ा ‘फैक्टर’ प्रदान करती है। उनके प्रशंसक इस शो को केवल उन्हें स्क्रीन पर देखने के लिए ही देख रहे हैं। रिजवान सजन, अदेल सजन और सतीश सनपाल जैसे दुबई के प्रमुख उद्यमी भी इस शो का अहम हिस्सा हैं, जो ‘देसी ब्लिंग’ में एक व्यावसायिक दृष्टिकोण जोड़ते हैं। हालाँकि, समस्या तब आती है जब शो का फोकस केवल उनके महंगे शौक तक ही सीमित रह जाता है और उनके व्यक्तित्व के गहरे पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है। सीरीज में ग्लैमर तो है, लेकिन क्या वह ग्लैमर दर्शकों के दिल में जगह बना पाएगा? फिलहाल, यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन शुरुआती रुझान यह बताते हैं कि यह शो चर्चा में रहने के लिए काफी है।
क्या यह दुबई ब्लिंग को टक्कर दे पाएगी?
जब हम ‘देसी ब्लिंग’ की तुलना ‘दुबई ब्लिंग’ से करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि दोनों का उद्देश्य एक ही है—लग्जरी को बेचना। नेटफ्लिक्स की रणनीति रही है कि वह ऐसे शोज बनाए जो दर्शकों को अपनी ओर खींचें, और ‘देसी ब्लिंग’ उस दिशा में एक सफल कदम है। हालाँकि, भारतीय दर्शकों की अपेक्षाएं थोड़ी अलग होती हैं। उन्हें केवल लग्जरी नहीं, बल्कि उस लग्जरी के पीछे की संवेदनाएं भी देखनी होती हैं। यदि आने वाले एपिसोड्स में ड्रामा और भावनाओं का सही संतुलन नहीं बैठा, तो यह सीरीज केवल कुछ दिनों की चर्चा बनकर रह जाएगी।
एक चमकती हुई लेकिन खाली दुनिया?
अंत में, ‘देसी ब्लिंग’ उन लोगों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है जो काम के बाद के थकान भरे घंटों में दिमाग न लगाने वाली चीजें देखना चाहते हैं। यह एक ऐसी दुनिया है जहाँ पैसा पानी की तरह बहाया जाता है और समस्याएं अक्सर तुच्छ होती हैं। आलोचकों के लिए यह भद्दी और बनावटी हो सकती है, लेकिन औसत दर्शक के लिए यह एक ‘मसालेदार’ सफर है। शो के निर्माता यह जानते हैं कि आज के दौर में ‘ट्रोलिंग’ और ‘चर्चा’ ही सफलता की कुंजी है। भले ही शो ‘आर्टिफिशियल’ हो, पर इसमें कोई शक नहीं कि यह लोगों को बांधे रखने का हुनर जानता है। यदि आप लग्जरी और ड्रामा के शौकीन हैं, तो ‘देसी ब्लिंग’ आपको एक बार तो देखने के लिए मजबूर कर ही देगी, भले ही बाद में आप इसकी आलोचना ही क्यों न करें।