पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ऐतिहासिक जीत की ओर। सुवेंदु अधिकारी ने भवानीपुर में ममता बनर्जी को दी करारी शिकस्त। जानें बंगाल की राजनीति में आए इस बड़े बदलाव के कारण।
पश्चिम बंगाल चुनाव: भाजपा की ऐतिहासिक बढ़त और तृणमूल की हार
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के परिणामों के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक बड़ी जीत की ओर बढ़ती दिख रही है। कोलकाता और साल्ट लेक स्थित भाजपा कार्यालयों के बाहर उत्सव का माहौल है। कार्यकर्ता केसरिया गुलाल के साथ होली खेल रहे हैं और ‘जय श्री राम’ के नारे लगा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि उत्सव में मिठाइयों के साथ-साथ झालमुड़ी भी बांटी जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान इस बंगाली स्नैक का आनंद लिया था और तंज कसते हुए कहा था, “मैंने झालमुड़ी खाई, लेकिन जलन (झाल) टीएमसी को हुई।”
सांस्कृतिक जुड़ाव और खान-पान की राजनीति
Speaking from the @BJP4India HQ in Delhi. https://t.co/Eu15QXV34v
— Narendra Modi (@narendramodi) May 4, 2026
साल्ट लेक स्थित भाजपा कार्यालय में कार्यकर्ताओं के लिए मछली-चावल, सब्जी और दाल तैयार की जा रही है। अक्सर शाकाहार की समर्थक मानी जाने वाली भाजपा ने इस बार बंगाल की संस्कृति से जुड़ने के लिए अपने अभियान में मछली को प्रमुखता दी। यह तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उस नैरेटिव का जवाब था, जिसमें भाजपा को ‘बाहरी लोगों की पार्टी’ और बंगाल विरोधी बताया गया था। इसके विपरीत, टीएमसी कार्यालय में सन्नाटा पसरा हुआ है और वहां केवल कुछ ही कार्यकर्ता नजर आ रहे हैं।
ममता बनर्जी की हार और सुवेंदु अधिकारी की जीत
इस चुनाव का सबसे बड़ा उलटफेर भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र में देखने को मिला, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भाजपा उम्मीदवार सुवेंदु अधिकारी ने 15,114 मतों से हरा दिया। अमित शाह ने अप्रैल में ही कहा था कि यदि भवानीपुर से ममता हारती हैं, तो राज्य में परिवर्तन अपने आप आ जाएगा। जीत के बाद सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि ममता बनर्जी का ‘राजनीतिक संन्यास’ शुरू हो गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें हिंदू, सिख, जैन और अन्य समुदायों का भरपूर समर्थन मिला है।
सत्ता विरोधी लहर और शहरी मतदाताओं का प्रभाव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शहरों और शहरी क्षेत्रों में भारी मतदान के पीछे सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) और ‘एसआईआर’ (SIR) प्रभाव ने बड़ी भूमिका निभाई है। विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, ग्रामीण इलाकों के विपरीत, कोलकाता जैसे बड़े शहरों के मतदाता सरकारी योजनाओं पर कम निर्भर हैं, इसलिए उन्होंने बदलाव के पक्ष में और सरकार के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुए बढ़-चढ़कर मतदान किया।