अपरा एकादशी का व्रत अपार पुण्य देने वाला माना जाता है। जानें इस साल कब है अपरा एकादशी, इसकी पौराणिक कथा और भगवान विष्णु को प्रसन्न करने की विधि।
हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, और ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को ‘अपरा एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। ‘अपरा’ का अर्थ होता है ‘अपार’, जिसका सीधा संबंध इस व्रत से मिलने वाले असीमित पुण्य और फल से है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति सच्ची निष्ठा के साथ अपरा एकादशी का व्रत रखता है, उसे जीवन के समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है और वह अपार सुख-संपत्ति का स्वामी बनता है। यह व्रत भगवान विष्णु के ‘त्रिविक्रम’ रूप को समर्पित है।
अपरा एकादशी का धार्मिक महत्व
अपरा एकादशी को ‘अचला एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में उल्लेख है कि इस व्रत को करने से वही पुण्य प्राप्त होता है जो कार्तिक मास में पुष्कर स्नान करने या गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने से मिलता है। मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति से जाने-अनजाने में कोई बड़ा पाप हो गया हो, जैसे कि ब्रह्महत्या, परनिंदा या असत्य भाषण, तो अपरा एकादशी का व्रत उन पापों के प्रभाव को कम करने में सहायक होता है। यह व्रत न केवल परलोक में सद्गति दिलाता है, बल्कि इस लोक में भी यश, कीर्ति और ऐश्वर्य प्रदान करता है।
अपरा एकादशी व्रत की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बहुत ही क्रूर और अधर्मी था। वज्रध्वज ने षड्यंत्र रचकर अपने बड़े भाई की हत्या कर दी और उसके शव को एक पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर उसी पेड़ पर रहने लगी और राहगीरों को परेशान करने लगी।
एक दिन धौम्य ऋषि वहां से गुजर रहे थे। उन्होंने अपनी तपोबल से प्रेत के पूर्व जन्म के बारे में जाना और दयावश उसे प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने का निर्णय लिया। ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत किया और उसका पुण्य उस प्रेत (राजा) को दान कर दिया। इस व्रत के प्रभाव से राजा प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य देह धारण कर स्वर्ग लोक चला गया। तभी से इस एकादशी का महत्व जगप्रसिद्ध हो गया।
पूजा विधि: कैसे करें भगवान विष्णु की आराधना
अपरा एकादशी की पूजा विधि अत्यंत सरल और फलदायी है। इसकी शुरुआत दशमी की रात से ही हो जाती है, जब व्रती को सात्विक भोजन करना चाहिए।
- ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर पवित्र नदी या घर पर ही गंगाजल मिले पानी से स्नान करें।
- संकल्प: भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
- पूजन सामग्री: भगवान विष्णु को पीले फूल, पीले वस्त्र, तुलसी दल, फल और पंचामृत अर्पित करें। इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का निरंतर जाप करना चाहिए।
- तुलसी का महत्व: एकादशी की पूजा में तुलसी दल का होना अनिवार्य है, क्योंकि बिना तुलसी के श्रीहरि भोग स्वीकार नहीं करते।
- रात्रि जागरण: एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। रात भर भगवान के भजनों और कीर्तनों के माध्यम से जागरण करना श्रेष्ठ माना जाता है।
पारण और नियम
एकादशी व्रत का समापन अगले दिन यानी ‘द्वादशी’ तिथि को पारण के साथ होता है। पारण हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करना चाहिए। व्रत खोलने से पहले किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें। इस दिन तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन), मांस-मदिरा और चावल के सेवन से पूरी तरह बचना चाहिए।
एकादशी व्रत की पूर्णता केवल नियमों के पालन और विधिवत पारण में ही निहित नहीं है, बल्कि इस दौरान मन की सात्विकता और इंद्रिय संयम भी अत्यंत आवश्यक है। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी के दिन परनिंदा, क्रोध और असत्य भाषण से बचना चाहिए, क्योंकि यह मानसिक तप का दिन होता है। व्रत के अगले दिन यानी द्वादशी को तुलसी पत्र के साथ चरणामृत लेकर व्रत खोलना बेहद शुभ माना जाता है। इसके अतिरिक्त, यदि पारण के समय हरि वासर (द्वादशी की पहली चौथाई अवधि) चल रहा हो, तो उस समय व्रत नहीं खोलना चाहिए, बल्कि इसके समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। श्रद्धापूर्वक किया गया यह अनुशासन न केवल शारीरिक शुद्धि करता है, बल्कि व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से भी सुदृढ़ बनाता है।