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RBI और IRDAI ने बैंकों और बीमा कंपनियों को कमोडिटी डेरिवेटिव्स में निवेश की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। सेबी अध्यक्ष ने सोमवार को इस नियामक गतिरोध की जानकारी दी।
सेबी के प्रयासों को लगा झटका: रेगुलेटर्स की असहमति आई सामने
भारतीय वित्तीय बाजार में कमोडिटी डेरिवेटिव्स (Commodity Derivatives) को मजबूती देने की दिशा में एक बड़ा अवरोध सामने आया है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (Sebi) के अध्यक्ष ने सोमवार को स्पष्ट किया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) फिलहाल बैंकों और बीमा कंपनियों को कमोडिटी डेरिवेटिव्स में निवेश की अनुमति देने के पक्ष में नहीं हैं। सेबी लंबे समय से इस कोशिश में था कि कमोडिटी मार्केट की गहराई और तरलता (Liquidity) बढ़ाने के लिए संस्थागत निवेशकों (Institutional Investors) जैसे बैंकों और पेंशन फंडों को इस बाजार में प्रवेश दिया जाए, लेकिन अन्य प्रमुख नियामकों की ओर से मिली इस ठंडी प्रतिक्रिया ने इन योजनाओं पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
सुरक्षा और जोखिम प्रबंधन को लेकर आरबीआई की चिंताएं
कमोडिटी मार्केट अक्सर अत्यधिक अस्थिरता (Volatility) के लिए जाना जाता है। कृषि उत्पादों से लेकर धातु और ऊर्जा तक, वैश्विक और घरेलू कारकों के कारण कीमतों में तेजी से उतार-चढ़ाव होता है। सूत्रों और बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आरबीआई का मुख्य उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता बनाए रखना है। बैंक जनता के पैसे (Public Deposits) का प्रबंधन करते हैं, और कमोडिटी जैसे जोखिम भरे डेरिवेटिव्स में निवेश से बैंकिंग एसेट की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। आरबीआई का मानना है कि डेरिवेटिव्स मार्केट में सट्टेबाजी (Speculation) के जोखिम बैंकों के पारंपरिक कार्य प्रोफाइल के साथ मेल नहीं खाते। इसी तरह, IRDAI भी बीमाधारकों के फंड की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है और जोखिम भरे एसेट्स में निवेश को लेकर काफी सतर्क रहता है।
सेबी का दृष्टिकोण: बाजार को संस्थागत समर्थन की जरूरत
पिछले साल सितंबर में, सेबी ने अपनी भविष्य की कार्ययोजना (Agenda) में यह स्पष्ट किया था कि वह सरकार के साथ मिलकर बैंकों और पेंशन फंडों को कमोडिटी ट्रेडिंग के लिए सक्षम बनाने की दिशा में काम करेगा। सेबी का तर्क है कि जब तक बड़े वित्तीय संस्थान इस बाजार में सक्रिय नहीं होंगे, तब तक कमोडिटी डेरिवेटिव्स मार्केट में वॉल्यूम और स्थिरता नहीं आएगी। वर्तमान में, भारत में कमोडिटी मार्केट मुख्य रूप से व्यक्तिगत निवेशकों और कुछ कॉर्पोरेट संस्थाओं तक सीमित है। सेबी चाहता है कि बैंकिंग और पेंशन फंड जैसे “पॉकेट साइज” वाले संस्थानों के आने से हेजिंग (Hedging) की लागत कम हो और बाजार में पारदर्शिता बढ़े।
आगे की राह और बाजार पर प्रभाव
नियामकों के बीच इस वैचारिक मतभेद का असर कमोडिटी एक्सचेंजों जैसे MCX और NCDEX पर भी पड़ सकता है। यदि बैंकों और बीमा कंपनियों को अनुमति नहीं मिलती है, तो नए उत्पादों (जैसे इंडेक्स फ्यूचर्स और ऑप्शंस) की सफलता सीमित रह सकती है। हालांकि, सेबी अध्यक्ष के बयान से यह भी संकेत मिलता है कि बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। आने वाले समय में, सेबी और सरकार मिलकर आरबीआई व IRDAI के साथ जोखिम कम करने वाले फ्रेमवर्क (Risk Mitigation Framework) पर चर्चा कर सकते हैं, ताकि भविष्य में एक नियंत्रित तरीके से इन संस्थानों के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। फिलहाल, कमोडिटी मार्केट को संस्थागत पूंजी के लिए और लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।