भारतीय उपभोक्ताओं का ‘लीगेसी ब्रांड्स’ पर अटूट भरोसा स्टार्टअप्स और वायरल ट्रेंड्स के दौरान भी जारी है: जानिए इसकी मूल वजह
आज भारत में बड़े तकनीकी और व्यावसायिक बदलाव हो रहे हैं। हर हफ्ते, एक नया स्टार्टअप बाजार में आता है, ‘डाइरेक्ट-टू-कंज्यूमर’ (D2C) ब्रांड्स के विज्ञापन सोशल मीडिया पर फैलते हैं और हर सप्ताह एक वायरल उपभोक्ता ट्रेंड वायरल होता है। क्विक-कॉमर्स ऐप्स के माध्यम से 10 मिनट में नए उत्पाद घर पहुंच रहे हैं। लेकिन भारी चमक-दमक और विकल्पों की भरमार के बावजूद, भारतीय उपभोक्ता आज भी दशकों पुराने ‘लीगेसी ब्रांड्स’ जैसे टाटा (Tata), बाटा (Bata), गोदरेज (Godrej), अमूल (Amul) और डाबर (Dabar) पर दांव लगाते हैं जब बात भरोसा, शुद्धता और दीर्घकालीन निवेश की आती है। भारी डिस्काउंट और आकर्षक पैकेजिंग के बावजूद, नवाबों ने अपनी पहचान नहीं खोई है। आइए देखें कि भारत आज भी इन पारंपरिक ब्रांड्स पर इतना मूर्ख क्यों है।
पीढ़ियों का भरोसा और भावनात्मक जुड़ाव
भारत का बाजार विश्व के अन्य बाजारों से बहुत अलग है। यहां खरीदारी एक भावनात्मक और पारिवारिक लेन-देन भी है। लीगेसी ब्रांड्स की सबसे बड़ी संपत्ति यह है कि वे तीन से चार पीढ़ियों को भारत में सेवाएं दी हैं।
उदाहरण के लिए, पारले-जी (Parle-G) बिस्कुट और अमूल दूध केवल उत्पाद नहीं हैं; ये हर भारतीय के बचपन से जुड़े हैं। जब कोई दादा अपने पोते के लिए कुछ खरीदता है, तो वह अनजाने में उसी ब्रांड को चुनता है जिसे उसके माता-पिता ने पहले देखा था। नए स्टार्टअप्स तकनीक और AI की मदद से तेजी से आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन वे तुरंत उस ‘भावनात्मक जुड़ाव’ (Nostalgia & Emotional Bond) को नहीं बना सकते, जिसे लीगेसी ब्रांड्स ने दशकों से खोज लिया है।
गुणवत्ता की निरंतरता और धन का मूल्य
भारतीय उपभोक्ता बहुत बुद्धिमान और मूल्य-चिन्हित है। उसे सबसे अच्छी और कम कीमत की चीज चाहिए होती है। स्टार्टअप अक्सर बहुत ज्यादा फंडिंग देकर शुरूआत करते हैं, लेकिन जैसे ही वे अपनी कीमतें बढ़ाते हैं या फंडिंग कम करते हैं, उनकी गुणवत्ता गिरने लगती है।
इसके विपरीत, लीगेसी ब्रांड्स ने अपनी गुणवत्ता (Consistency in Quality) को वर्षों से बरकरार रखा है। टाटा नमक (Tata Salt) आज भी दस साल पहले की तरह शुद्ध और स्वादिष्ट होगा। गोदरेज के अलमारी या बाटा के जूते भी टिकाऊ और मजबूत होते हैं। भारतीय मध्यमवर्ग को पता है कि इन ब्रांड्स पर खर्च किया गया एक-एक पैसा पूरी तरह से वापस मिल जाएगा, जबकि नए वायरल ब्रांड्स की जीवनकाल की कोई गारंटी नहीं है।
संकटकाल में विश्वसनीयता और ‘टिकाऊपन’
भारतीय उपभोक्ताओं ने पिछले कुछ सालों में कई बड़े स्टार्टअप्स को बहुत तेजी से विकसित होते देखा है। EdTech कंपनियां या कुछ बड़े फिनटेक और डी2सी ब्रांड्स, कॉर्पोरेट गवर्नेंस की कमी, वित्तीय गबन या अचानक बंद होने से नए ब्रांडों की साख प्रभावित हुई है। उपभोक्ता को इसलिए डरना स्वाभाविक है।
भारतीय लोग हमेशा सुरक्षित विकल्प की ओर भागते हैं जब बाजार में अनिश्चितता है। टाटा या महिंद्रा केवल बिजनेस नहीं करते; वे देश और समाज के साथ खड़े दिखाई देते हैं जब कोई संकट आता है, जैसे महामारी या आर्थिक मंदी। उन्हें जनता की दृष्टि में एक व्यापारी से ऊपर उठाकर एक ‘अभिभावक’ (Guardian Institution) बनाया गया है, यह सामाजिक जिम्मेदारी और देश के विकास में उनका ऐतिहासिक योगदान है। लोग जानते हैं कि ये ब्रांड्स सफल नहीं होंगे।
मजबूत ऑफलाइन विपणन और ग्रामीण भारत में प्रवेश
डिजिटल क्रांति के बाद भी, भारत का एक बड़ा हिस्सा ‘भारत’ (ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्र) में रहता है, जो इंटरनेट और मेट्रो शहरों से दूर है। हाल ही में शुरू हुए अधिकांश स्टार्टअप्स पूरी तरह से डिजिटल हैं, या तो एकमात्र ऐप या मेट्रो-केंद्रित हैं। उनकी पहुंच सिर्फ टियर-3 गांवों या शहरों तक सीमित है।
दूसरी ओर, लीगेसी ब्रांड्स का ऑफलाइन सप्लाई नेटवर्क असफल है। हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL) का साबुन या डाबर का च्यवनप्राश देश के सबसे दूर स्थान पर भी आसानी से मिल जाएगा। लीगेसी ब्रांड्स ने लंबे समय से देश भर में खुदरा विक्रेताओं (Retailers) के साथ एक मजबूत नेटवर्क बनाया है, जिससे किसी भी नए स्टार्टअप को मुकाबला करना महंगा और महंगा है।
लीगेसी ब्रांड्स की आजादी: बदलाव स्वीकार करना
पुराने ब्रांड्स अब ‘रूढ़िवादी’ नहीं हैं, जो एक और महत्वपूर्ण कारण है। समय के साथ वे बदल गए हैं। टाटा डिजिटल की मदद से आज अमूल क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर सबसे अधिक बिकने वाला ब्रांड बन चुका है।
ये पुरानी कंपनियां आधुनिक तकनीक, नए स्वाद और ट्रेंडी मार्केटिंग के साथ अपनी पुरानी मान्यता को जोड़ रही हैं। वे युवा पीढ़ी (Gen Z और Millennials) को आकर्षित करने के लिए कई तरीके जानते हैं, लेकिन वे अपने मूल मूल्यों (Core Values) से अलग रहते हैं।
Start-ups के लिए टिप्स
Startups और वायरल कंज्यूमर ट्रेंड्स उत्साह, नवीनता और तकनीकी चपलता (Agility) को बाजार में लाते हैं, जो बहुत जरूरी है। लेकिन लंबी रेस का घोड़ा बनने के लिए सिर्फ सोशल मीडिया क्रेज या हाइप पर्याप्त नहीं हैं।
भारत का बाजार आज भी चिल्लाकर यह संदेश दे रहा है कि ग्राहकों का दिल जीतने के लिए दशकों का धैर्य, निरंतरता और ईमानदारी चाहिए, न कि ‘फ्लैश सेल’। यही कारण है कि भारतीय उपभोक्ता रूपी जहाज आज भी लीगेसी ब्रांड्स की मजबूत स्थिरता से ही बंधा हुआ है, हालांकि नए ट्रेंड्स के इस समंदर में भी।