हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। 15 मई 2026 को सुहागिनें बरगद के पेड़ की पूजा कर पति की लंबी उम्र की कामना करेंगी। जानें इस व्रत की कथा, मुहूर्त और पूजा के लिए आवश्यक चीजों की लिस्ट।
हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण और पूजनीय व्रतों में से एक है। यह व्रत न केवल पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है, बल्कि यह सती सावित्री के अटूट संकल्प और पतिव्रत धर्म का प्रतीक भी है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व सामूहिक पूजा और पारंपरिक उल्लास का अनूठा संगम है।
वट सावित्री व्रत का महत्व और पौराणिक संदर्भ
वट सावित्री व्रत की जड़ें देवी सावित्री और सत्यवान की कथा में समाहित हैं। कथा के अनुसार, जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तब सावित्री ने अपने तपोबल और बुद्धिमत्ता से यमराज को विवश कर दिया कि वे उनके पति के प्राण लौटा दें। यमराज ने सावित्री की निष्ठा से प्रसन्न होकर सत्यवान को पुनर्जीवित किया।
चूंकि सावित्री ने अपने पति के प्राणों की रक्षा वट (बरगद) वृक्ष के नीचे की थी, इसलिए इस वृक्ष को ‘अक्षय वट’ माना गया और इसकी पूजा का विधान बना। बरगद के पेड़ को त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का रूप माना जाता है, जिसमें इसकी शाखाओं में शिव, जड़ों में ब्रह्मा और छाल में विष्णु का वास माना जाता है।
वट सावित्री व्रत 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में ज्येष्ठ अमावस्या की तिथि को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष वट सावित्री व्रत 15 मई 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। सुहागिन महिलाएं इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि के बाद व्रत का संकल्प लेती हैं और वट वृक्ष की पूजा कर अपने अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।
वट सावित्री व्रत की अनिवार्य पूजन सामग्री
इस व्रत की पूजा में विशेष प्राकृतिक और पारंपरिक चीजों का उपयोग किया जाता है। यदि आप इस व्रत की तैयारी कर रही हैं, तो सुनिश्चित करें कि आपके पास निम्नलिखित सामग्रियां उपलब्ध हों:
1. मुख्य सामग्रियां
सती सावित्री और सत्यवान की मूर्ति: पूजा के लिए मिट्टी या धातु की मूर्तियां (आजकल फोटो का भी उपयोग होता है)।
- बांस का पंखा: यह इस व्रत की सबसे विशिष्ट सामग्री है। इससे वट वृक्ष और मूर्तियों को हवा की जाती है।
- कच्चा सूत (सफेद या पीला): बरगद के पेड़ के चारों ओर परिक्रमा करते हुए सूत लपेटने के लिए।
- धूप, दीप और अगरबत्ती: वातावरण को शुद्ध और भक्तिमय बनाने के लिए।
2. श्रृंगार और सुहाग का सामान
चूंकि यह सुहाग का पर्व है, इसलिए माता सावित्री को सुहाग की पिटारी चढ़ाई जाती है, जिसमें शामिल हैं:
- लाल चुनरी, बिंदी, सिंदूर, चूड़ियां, मेहंदी, काजल और बिछिया।
3. नैवेद्य और फल
बरगद का फल (प्रतीकात्मक): या आटे से बने छोटे फल।
- भिगोए हुए चने: पूजा में भीगे हुए चनों का विशेष महत्व है।
- ऋतु फल: आम, लीची, खरबूजा और केला।
- पकवान: घर में बने पुए, पूरी और हलवा।
- पूजन विधि: बरगद के वृक्ष की परिक्रमा
वट सावित्री की पूजा में बरगद के पेड़ की परिक्रमा का विशेष महत्व है। महिलाएं सज-धज कर वट वृक्ष के पास एकत्र होती हैं और निम्नलिखित चरणों का पालन करती हैं: - सर्वप्रथम वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें और सिंदूर, अक्षत व फूल चढ़ाएं।
- इसके बाद सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें या पढ़ें।
- कच्चा सूत लेकर वट वृक्ष की 7, 11, 21, 51 या 108 बार परिक्रमा करें। प्रत्येक परिक्रमा के साथ सूत को तने पर लपेटा जाता है।
- पूजा के अंत में चने और फल का दान किया जाता है और अपने पति व बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है।
विश्वास और परंपरा का अटूट बंधन
वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति और समर्पण का उत्सव है। बरगद का वृक्ष अपनी लंबी आयु और विशालता के लिए जाना जाता है, और महिलाएं इसी वृक्ष की तरह अपने वैवाहिक जीवन की स्थिरता और विस्तार की प्रार्थना करती हैं।