वट सावित्री व्रत 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा के कड़े नियम; इन 5 गलतियों से बचें सुहागिन महिलाएं

वट सावित्री व्रत 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा के कड़े नियम; इन 5 गलतियों से बचें सुहागिन महिलाएं

 

वट सावित्री व्रत पर बरगद की पूजा का है विशेष महत्व। जानें किन नियमों का पालन करना है जरूरी और किन गलतियों से आपकी पूजा हो सकती है निष्फल। अखंड सौभाग्य के लिए पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म के सबसे पावन और कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। यह पर्व सती सावित्री के उस अटूट संकल्प की याद दिलाता है, जिसके बल पर उन्होंने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस छीन लिए थे। ज्येष्ठ अमावस्या के दिन सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार कर बरगद (वट) के वृक्ष की पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास होता है।

शास्त्रों के अनुसार, श्रद्धा के साथ-साथ नियमों का सही पालन करना भी अनिवार्य है। अनजाने में की गई छोटी सी चूक पूजा के पुण्य को कम कर सकती है। यहाँ वट सावित्री व्रत के नियम, सावधानियां और पूजा विधि पर विस्तृत रिपोर्ट दी गई है:

वट सावित्री व्रत 2026: सुहागिनों के अखंड सौभाग्य का महापर्व; पूजा के दौरान भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना अधूरा रह जाएगा फल
वट सावित्री का व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धैर्य और विधि-विधान का संगम है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे ही अपने पति को पुनः जीवित पाया था, इसीलिए इस वृक्ष को ‘अक्षय’ और ‘पूजनीय’ माना गया है।

वट वृक्ष की परिक्रमा का महत्व और सही नियम

पूजा के दौरान वट वृक्ष की परिक्रमा सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। महिलाएं वृक्ष के चारों ओर सूती धागा या कलावा लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं।

सावधानी: परिक्रमा करते समय ध्यान रहे कि धागा बीच में टूटना नहीं चाहिए। धागा टूटना अशुभ माना जाता है। यदि ऐसा हो जाए, तो तुरंत हाथ जोड़कर क्षमा मांगें और नया धागा लपेटना शुरू करें। आमतौर पर 7, 11, 21, 51 या 108 बार परिक्रमा करने का विधान है।

भूलकर भी न करें ये गलतियां

अक्सर अनजाने में महिलाएं कुछ ऐसी गलतियां कर बैठती हैं जो वर्जित मानी गई हैं:

  • रंगों का चुनाव: पूजा में काले, नीले या सफेद रंग के वस्त्र या चूड़ियों का प्रयोग वर्जित है। अखंड सौभाग्य के लिए लाल, पीला, हरा या गुलाबी रंग सबसे शुभ माना गया है।
  • वट वृक्ष की टहनी तोड़ना: कई महिलाएं घर पर पूजा के लिए वट वृक्ष की टहनी तोड़कर ले आती हैं। शास्त्रों के अनुसार, पूजा के लिए जीवित वृक्ष की टहनी तोड़ना पाप माना गया है। संभव हो तो मंदिर या सार्वजनिक स्थान पर स्थित वृक्ष की ही पूजा करें।
  • बासी सामग्री का प्रयोग: पूजा में इस्तेमाल होने वाले फल, फूल और विशेष रूप से बरगद के फल ताजे होने चाहिए।

व्रत और पारण की सही विधि

यह व्रत अत्यंत कठिन होता है क्योंकि इसमें निर्जला रहने की परंपरा है। जो महिलाएं स्वास्थ्य कारणों से निर्जला नहीं रह सकतीं, वे फलाहार कर सकती हैं।

  • कथा श्रवण: सावित्री और सत्यवान की कथा सुने बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है। कथा सुनते समय हाथ में चने के दाने रखना अनिवार्य है।
  • दान का महत्व: पूजा के बाद भीगे हुए चने, वस्त्र और फल किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को दान करना चाहिए। साथ ही, सास या किसी बुजुर्ग महिला का आशीर्वाद लेना अनिवार्य है।

सोलह श्रृंगार का आध्यात्मिक पहलू

वट सावित्री में सुहागिनों के लिए सोलह श्रृंगार का विशेष महत्व है। यह केवल सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि सौभाग्य की समृद्धि के लिए है। पूजा के बाद महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, जिसे सावित्री के आशीर्वाद का आदान-प्रदान माना जाता है। मान्यता है कि ज्येष्ठ की चिलचिलाती धूप में बरगद की ठंडी छाया और यह व्रत पति के जीवन पर आने वाले हर संकट को दूर कर देता है।

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