श्रद्धा कपूर की आगामी फिल्म ‘ईथा’ का टीज़र जारी। लावणी कलाकार विठाबाई नारायणगांवकर के जीवन पर बनी इस फिल्म में श्रद्धा के साहसी किरदार की झलक।
बॉलीवुड की चुलबुली अभिनेत्री श्रद्धा कपूर अपनी आगामी बायोपिक ‘ईथा’ (Eetha) के साथ एक बेहद गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिका में नजर आने वाली हैं। हाल ही में फिल्म के पोस्टर और टीज़र ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है। फिल्म में श्रद्धा कपूर महाराष्ट्र की महान लावणी कलाकार विठाबाई नारायणगांवकर की भूमिका निभा रही हैं। टीज़र में श्रद्धा का लुक और उनका अभिनय न केवल प्रशंसकों को हैरान कर रहा है, बल्कि फिल्म बिरादरी भी उनके इस रूपांतरण की प्रशंसा कर रही है। फिल्म 28 अगस्त, 2026 को रिलीज होने के लिए पूरी तरह तैयार है।
विठाबाई का जीवट: मंच और मातृत्व का अनूठा संगम
‘ईथा’ का टीज़र विठाबाई नारायणगांवकर के जीवन के उस अविश्वसनीय अध्याय को दिखाता है, जिसने इतिहास रच दिया था। टीज़र के दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं, जिसमें श्रद्धा कपूर एक गर्भवती कलाकार के रूप में मंच पर अपने कौशल का प्रदर्शन कर रही हैं। कहानी के सबसे नाटकीय और भावुक मोड़ पर, विठाबाई को मंच पर ही प्रसव पीड़ा शुरू हो जाती है। एक साधारण कलाकार के लिए यह समय मंच छोड़ने का हो सकता था, लेकिन विठाबाई का समर्पण कुछ और ही था।
वे संयम के साथ मंच के पीछे जाती हैं और वहीं अपने बच्चे को जन्म देती हैं। इसके बाद जो होता है, वह किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है—साहस की पराकाष्ठा दिखाते हुए, वे पत्थर से ही गर्भनाल (umbilical cord) काटती हैं और तुरंत वापस मंच पर आकर अपना अधूरा नृत्य पूरा करती हैं। विठाबाई का यह समर्पण और जीवटता न केवल दर्शकों को स्तब्ध कर देती है, बल्कि उनके प्रति श्रद्धा भी जगाती है। यह दृश्य दिखाता है कि ‘तमाशा साम्राज्ञी’ के लिए मंच कोई काम नहीं, बल्कि उनका अस्तित्व था।
कौन थीं विठाबाई नारायणगांवकर?
विठाबाई भाऊ मांग नारायणगांवकर का जन्म 1 जुलाई, 1935 को हुआ था। उन्हें महाराष्ट्र के लोक प्रदर्शनों की दुनिया में ‘तमाशा साम्राज्ञी’ के रूप में जाना जाता है। तमाशा एक जीवंत लोक थिएटर विधा है, जिसमें संगीत, नृत्य, नाटक, हास्य और सामाजिक कटाक्ष का अद्भुत संगम होता है। विठाबाई का पालन-पोषण इसी कला परंपरा में हुआ था। उनके दादाजी नारायण खुडे द्वारा स्थापित तमाशा मंडली को उन्होंने नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।
विठाबाई केवल एक नृत्यांगना नहीं थीं, बल्कि वे एक ऐसी कलाकार थीं जिन्होंने लावणी, गवलन और अन्य लोक विधाओं पर अपनी गहरी पकड़ बनाई थी। उनकी आवाज़ का जादू, लय पर उनकी पकड़, चेहरे के भाव और मंच पर उनका रौबदार व्यक्तित्व ही उन्हें एक ऐसी कलाकार बनाता था, जिसे देखने वाला कभी भुला नहीं पाता था। वे मंच पर महज अभिनय नहीं करती थीं, बल्कि वे उस मंच को जीती थीं।
श्रद्धा कपूर का रूपांतरण: एक कठिन और प्रशंसनीय सफर
श्रद्धा कपूर के लिए ‘ईथा’ उनके करियर का अब तक का सबसे कठिन रूपांतरण साबित हो सकती है। अपनी ‘गर्ल-नेक्स्ट-डोर’ और सौम्य छवि के लिए मशहूर श्रद्धा का इस तरह की चुनौतीपूर्ण भूमिका में उतरना दर्शकों के लिए एक सुखद आश्चर्य है। विठाबाई की भूमिका केवल कॉस्ट्यूम या कोरियोग्राफी के बारे में नहीं है, बल्कि यह उस ‘मिट्टी’ और ‘अहंकार’ को पकड़ने के बारे में है जो एक लोक कलाकार में होती है।
टीज़र में श्रद्धा की साड़ी, गहने, मेकअप और विशेष रूप से उनके बैठने के तरीके (posture) से साफ पता चलता है कि उन्होंने इस किरदार को निभाने के लिए कितनी मेहनत की है। वे उस शहरी और ग्लैमरस दुनिया से पूरी तरह बाहर निकलकर एक ऐसे दौर और परिवेश में प्रवेश कर गई हैं, जिसे पर्दे पर उतारना आसान नहीं है। रणदीप हुड्डा और मोहम्मद जीशान अय्यूब जैसे बेहतरीन अभिनेताओं के साथ ‘ईथा’ में श्रद्धा कपूर का यह प्रदर्शन भारतीय सिनेमा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह फिल्म न केवल विठाबाई के जीवन का उत्सव है, बल्कि यह उन सभी महिलाओं को श्रद्धांजलि भी है जिन्होंने कला और कर्तव्य के बीच कभी किसी एक को नहीं चुना, बल्कि दोनों को जीकर दिखाया।