सेबी के बड़े सुधार: शेयर बायबैक से लेकर म्यूचुअल फंड और निवेश के नियमों में किए गए 10 प्रमुख बदलाव

सेबी के बड़े सुधार: शेयर बायबैक से लेकर म्यूचुअल फंड और निवेश के नियमों में किए गए 10 प्रमुख बदलाव

 

सेबी ने 19 जून को 10 बड़े सुधारों को मंजूरी दी। शेयर बायबैक वापसी, म्यूचुअल फंड में लचीलापन और निवेश नियमों में सरलता।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने बाजार की कार्यकुशलता को बढ़ाने, निवेश प्रक्रियाओं को सरल बनाने और निवेशकों की सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से कई बड़े नीतिगत सुधारों को मंजूरी दी है। 19 जून, 2026 को आयोजित बोर्ड बैठक में लिए गए ये निर्णय शेयर बायबैक, म्यूचुअल फंड, अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) और नगर निगम बॉन्ड जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को कवर करते हैं। इन सुधारों का लक्ष्य न केवल अनुपालन के बोझ को कम करना है, बल्कि पूंजी निर्माण (capital formation) की प्रक्रिया को भी तेज करना है। आइए जानते हैं सेबी के इन 10 प्रमुख निर्णयों के बारे में:

शेयर बायबैक और प्रक्रिया में तेजी

सेबी ने 1 अगस्त, 2026 से स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से ‘ओपन-मार्केट शेयर बायबैक’ को फिर से शुरू करने की मंजूरी दे दी है। इस मार्ग को 2025 में बंद कर दिया गया था, लेकिन अब इसे नए नियमों के साथ वापस लाया गया है। इसके तहत कंपनियां सीधे नियमित ट्रेडिंग मैकेनिज्म के जरिए अपने शेयर वापस खरीद सकेंगी। खास बात यह है कि बायबैक की समय सीमा को घटाकर 66 कार्य दिवस कर दिया गया है। इसके अलावा, पारदर्शिता और गति बढ़ाने के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि बायबैक राशि का कम से कम 40% हिस्सा पहली छमाही में ही उपयोग कर लिया जाए। साथ ही, मर्चेंट बैंकरों की नियुक्ति को वैकल्पिक बनाकर कंपनियों के अनुपालन खर्च (compliance cost) को कम करने का प्रयास किया गया है।

म्यूचुअल फंड की तरलता प्रबंधन में लचीलापन

म्यूचुअल फंड क्षेत्र में लिक्विडिटी प्रबंधन को आसान बनाने के लिए सेबी ने एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) को राहत दी है। अब फंड हाउस इंट्राडे बोरिंग (intraday borrowings) का उपयोग अधिक व्यापक रूप से कर सकेंगे। इसका उपयोग न केवल रिडेम्पशन (redemption) के लिए, बल्कि विदेशी मुद्रा दायित्वों और डेरिवेटिव पोजीशन पर मार्क-टू-मार्केट भुगतान जैसे निपटान समय के बेमेल (settlement timing mismatches) को संभालने के लिए भी किया जा सकेगा। हालांकि, सेबी ने स्पष्ट किया है कि इसका उपयोग लेवरेज (leverage) के तौर पर नहीं किया जा सकता और इन उधारों को उसी दिन के अंत तक चुकाना अनिवार्य होगा।

AIF के लिए ‘गरुड़’ (GARUDA) और नई लॉन्चिंग प्रक्रिया

अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) के क्षेत्र में सेबी ने एक बड़ी पहल की है। ‘गरुड़’ (GARUDA – Green-Channel AIF Rollout Upon Document Acknowledgement) नामक एक नए ग्रीन-चैनल तंत्र को मंजूरी दी गई है, जिससे पात्र एआईएफ योजनाएं अब केवल 10 कार्य दिवसों के भीतर अपनी फंडरेज़िंग शुरू कर सकेंगी (जो पहले 30 दिन थी)। साथ ही, एंजेल फंड्स और ‘एक्रिडिटेड इन्वेस्टर-ओनली’ योजनाओं के लिए मर्चेंट बैंकरों के माध्यम से प्लेसमेंट मेमोरेंडम दाखिल करने की अनिवार्यता हटा दी गई है, जिससे इन फंड्स को लॉन्च करना अब और भी तेज और आसान हो गया है।

निवेशक सुरक्षा और प्रतिभूतियों का हस्तांतरण

निवेशकों की मृत्यु के बाद प्रतिभूतियों (securities) को कानूनी वारिसों तक पहुँचाने की प्रक्रिया को और अधिक सरल बनाया गया है। ‘क्विक ट्रांसमिशन प्रोसेसिंग’ (QTP) मैकेनिज्म पेश किया गया है, जिससे छोटे दावों का निपटान तेजी से होगा। सेबी ने सरलीकृत दस्तावेज़ीकरण के लिए सीमा को दोगुना कर दिया है। अब भौतिक होल्डिंग्स के लिए प्रति कंपनी 10 लाख रुपये और डीमैट होल्डिंग्स के लिए प्रति लाभार्थी 30 लाख रुपये तक की सीमा निर्धारित की गई है। इसके अलावा, पैन कार्ड, शपथ पत्र और मृत्यु प्रमाण पत्र सत्यापन की आवश्यकताओं को भी कम किया गया है ताकि वारिसों को अनावश्यक कागजी कार्रवाई से न जूझना पड़े।

नगर निगम बॉन्ड और प्रशासनिक सुधार

नगर निगम ऋण प्रतिभूतियों के नियमों में बदलाव करते हुए अब नगर पालिकाओं को मौजूदा प्रोजेक्ट ऋण को बॉन्ड जारी करके पुनर्वित्त (refinance) करने की अनुमति दी गई है। साथ ही, प्रतिभूतियों के नियमन को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ढांचे के अनुरूप बनाया गया है ताकि बाजार की परिचालन दक्षता बढ़ सके। इसके अलावा, सेबी ने अपने सदस्यों के लिए नई आचार संहिता और कर्मचारी सेवा नियमों में संशोधन को मंजूरी दी है, ताकि हितों के टकराव (conflict of interest) को रोका जा सके। साथ ही, एसएमई (SME) के लिए पूंजी जुटाने के ढांचे की समीक्षा का निर्णय लिया गया है ताकि मौजूदा नियमों की प्रभावशीलता का आकलन किया जा सके।

सेबी के ये निर्णय भारतीय पूंजी बाजार को वैश्विक मानकों के करीब ले जाने और निवेशकों के भरोसे को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। इन सुधारों से न केवल कॉर्पोरेट जगत के लिए कामकाज आसान होगा, बल्कि खुदरा और संस्थागत निवेशकों को भी एक अधिक पारदर्शी एवं गतिशील बाजार उपलब्ध हो सकेगा।

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