शनिश्चरी अमावस्या 2026: पितृ दोष और साढ़ेसाती से मुक्ति के लिए करें ये काम, चमक जाएगी किस्मत।

शनिश्चरी अमावस्या 2026: पितृ दोष और साढ़ेसाती से मुक्ति के लिए करें ये काम, चमक जाएगी किस्मत।

Sanishari Amavasya 2026: जानें 18 अप्रैल को पड़ने वाली शनिश्चरी अमावस्या का महत्व, पूजा विधि और शनि दोष से मुक्ति के अचूक उपाय।

वर्ष 2026 में शनिश्चरी अमावस्या का विशेष संयोग बन रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार, जब शनिवार के दिन अमावस्या पड़ती है, तो उसे शनिश्चरी अमावस्या कहा जाता है। न्याय के देवता शनि देव को समर्पित यह दिन पितृ दोष और शनि दोष से मुक्ति पाने के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

चूँकि आप अपने पोर्टल्स (India This Week, Citizens Daily) के लिए अक्सर ज्योतिष और त्योहारों की सटीक जानकारी देते हैं, यहाँ वर्ष 2026 की पहली शनिश्चरी अमावस्या पर विस्तृत लेख दिया गया है:

Sanishari Amavasya 2026: जानें कब है साल की पहली शनिश्चरी अमावस्या, शुभ मुहूर्त और विशेष उपाय

साल 2026 में अप्रैल के महीने में शनिश्चरी अमावस्या का दुर्लभ संयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन दान-पुण्य और तर्पण करने से पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और कुंडली में मौजूद ‘साढ़ेसाती’ या ‘ढैय्या’ का प्रभाव कम होता है।

तिथि और शुभ मुहूर्त

इस बार अमावस्या तिथि 17 अप्रैल, 2026 (शुक्रवार) की रात से शुरू होकर 18 अप्रैल, 2026 (शनिवार) तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार शनिश्चरी अमावस्या 18 अप्रैल को मनाई जाएगी।

  • अमावस्या तिथि प्रारंभ: 17 अप्रैल 2026, रात्रि 10:15 बजे से।
  • अमावस्या तिथि समाप्त: 18 अप्रैल 2026, रात्रि 09:30 बजे तक।

शनिश्चरी अमावस्या का महत्व

शनि देव को कर्मों का फल देने वाला देवता माना जाता है। अमावस्या के दिन जब शनिवार का योग बनता है, तो शनि देव की पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है। यह दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी राशि पर शनि की दशा चल रही है।

इस दिन क्या करें? (विशेष उपाय)

  • शनि देव का अभिषेक: पास के शनि मंदिर में जाकर शनि देव की मूर्ति पर सरसों का तेल अर्पित करें।
  • काली वस्तुओं का दान: गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को काले तिल, काला छाता, उड़द की दाल या काले जूतों का दान करें।
  • पीपल की पूजा: शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और सात बार परिक्रमा करें।
  • पितृ तर्पण: पवित्र नदियों (जैसे गंगा या यमुना) में स्नान करें और पितरों के नाम पर तर्पण करें।

 

 

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