‘हमारे पास घर कहने के लिए कोई जगह नहीं बची…’ समय रैना ने सुनाई कश्मीरी पंडित पलायन की दर्दनाक कहानी

‘हमारे पास घर कहने के लिए कोई जगह नहीं बची…’ समय रैना ने सुनाई कश्मीरी पंडित पलायन की दर्दनाक कहानी

 

कॉमेडियन समय रैना ने Dostcast पॉडकास्ट में कश्मीरी पंडित पलायन के दौरान अपने परिवार की दर्दनाक कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि उनके नाना को जान से मारने की धमकी मिली थी और स्थानीय कश्मीरी मुसलमानों ने उनकी जान बचाने में मदद की।

कॉमेडियन और कंटेंट क्रिएटर समय रैना (Samay Raina) ने एक बार फिर अपने परिवार से जुड़े कश्मीरी पंडित पलायन के अनुभव साझा कर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। हाल ही में India’s Got Latent में उनके एक छोटे से बयान की चर्चा हुई थी, लेकिन इससे पहले वह Dostcast पॉडकास्ट में इस विषय पर विस्तार से बात कर चुके हैं। पॉडकास्ट में समय ने बताया कि 1990 के दशक में कश्मीर में बढ़ती हिंसा के दौरान उनके परिवार को रातोंरात घाटी छोड़नी पड़ी थी। उन्होंने यह भी बताया कि उस कठिन समय में कुछ स्थानीय कश्मीरी मुसलमानों ने उनके नाना की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। समय के अनुसार, यह अनुभव उनके परिवार के जीवन का सबसे दर्दनाक अध्याय रहा है, जिसकी यादें आज भी उन्हें भावुक कर देती हैं।

‘कश्मीरी पंडितों के पास लौटने के लिए अपना घर नहीं बचा’

पॉडकास्ट के दौरान समय रैना ने अलग-अलग समुदायों के अपने गृह राज्य से जुड़े भावनात्मक लगाव का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जैसे गुजरात के लोग दुनिया के किसी भी कोने में रहें, लेकिन अपने राज्य लौटने पर उन्हें घर जैसा एहसास होता है। इसके विपरीत, कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए यह भावना काफी अलग है।

समय ने कहा कि उनकी पीढ़ी के कई लोग कश्मीर में कभी स्थायी रूप से नहीं रहे, इसलिए जब वे वहां जाते हैं तो अपनेपन के बजाय डर और अनिश्चितता महसूस होती है। वहीं उनके माता-पिता की पीढ़ी के लिए कश्मीर की यादें भावनात्मक और दर्द से भरी हुई हैं। उन्होंने बताया कि जब उनकी मां कई वर्षों बाद पहली बार कश्मीर गईं तो वह बेहद भावुक हो गईं। लेकिन जब उन्होंने अपना पुराना घर और बदले हुए हालात देखे तो उनकी आंखों से आंसू निकल आए और वह यात्रा उनके लिए एक पीड़ादायक स्मृति बन गई।

‘मेरे नाना को मारने की धमकी मिली थी’

समय रैना ने बताया कि उनके नाना गांव के एक प्रसिद्ध डॉक्टर थे और लोगों की सेवा के लिए जाने जाते थे। लेकिन उग्रवाद के दौर में उन्हें भी निशाना बनाया गया। समय के अनुसार, उस समय उनके परिवार को एक पर्ची मिली, जिसमें लिखा था कि उनके नाना को मार दिया जाएगा और उन्हें तुरंत कश्मीर छोड़ देना चाहिए।

उन्होंने बताया कि उस दौर में कई कश्मीरी पंडितों ने अपना घर छोड़ने से इनकार कर दिया था। उनका मानना था कि वे अपनी जन्मभूमि नहीं छोड़ेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए। लेकिन बाद में उनमें से कई लोगों की हत्या कर दी गई। समय ने कहा कि उनके परिवार के लिए वह समय बेहद भयावह था और हर दिन अनिश्चितता से भरा हुआ था।

परिवार पर टूटा दुख का पहाड़

समय ने बताया कि जैसे ही उनके परिवार को यह जानकारी मिली कि उनके नाना को निशाना बनाया गया है, पूरे परिवार में भय का माहौल बन गया। उन्होंने कहा कि उनकी मां और नानी इस खबर को सुनकर बेहोश हो गई थीं।

उन्होंने बताया कि उनकी मौसी चुपचाप उनके नाना के क्लिनिक पहुंचीं, जहां उनके होने की आशंका थी। परिवार को इस बात का डर था कि कहीं वहां हमला न हो जाए। उस समय हर पल परिवार के लिए चिंता और असुरक्षा से भरा हुआ था।

‘स्थानीय कश्मीरी मुसलमानों ने बचाई जान’

समय रैना ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके नाना की वर्षों की सेवा और समाज में बनी अच्छी छवि ने उस कठिन समय में उनकी जान बचाई। उन्होंने कहा कि स्थानीय कश्मीरी मुसलमानों ने उनके नाना को सुरक्षित बाहर निकालने में मदद की।

समय के अनुसार, उनके नाना अक्सर गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज करते थे और लोगों की आर्थिक स्थिति देखकर उनसे फीस नहीं लेते थे। यही कारण था कि स्थानीय लोगों के मन में उनके प्रति गहरा सम्मान था। उन्होंने बताया कि कुछ कश्मीरी मुसलमानों ने यह सुनिश्चित किया कि उनके नाना को कोई नुकसान न पहुंचे और उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया जाए।

समय ने इस घटना का जिक्र करते हुए उन लोगों के प्रति सार्वजनिक रूप से आभार व्यक्त किया और कहा कि संकट की उस घड़ी में इंसानियत ने धर्म और समुदाय से ऊपर उठकर काम किया।

रातोंरात छोड़ना पड़ा अपना घर

समय रैना ने बताया कि हालात इतने गंभीर हो गए थे कि उनके परिवार को रातोंरात अपना घर छोड़ना पड़ा। उन्होंने कहा कि परिवार ने केवल जरूरी सामान लिया और यह सोचकर कश्मीर से निकल गया कि कुछ ही सप्ताह में हालात सामान्य हो जाएंगे और वे वापस लौट आएंगे।

परिवार पहले उधमपुर पहुंचा और उन्हें उम्मीद थी कि दो-तीन सप्ताह में सब कुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। समय ने कहा कि जो सफर कुछ दिनों के लिए शुरू हुआ था, वह वर्षों का विस्थापन बन गया और उनका परिवार लगभग 25 वर्षों तक अपने घर वापस नहीं लौट सका।

एक दर्द जो आज भी जिंदा है

समय रैना का कहना है कि कश्मीरी पंडित पलायन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के जीवन में गहरा व्यक्तिगत दर्द है। उन्होंने कहा कि उनके माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के लिए कश्मीर केवल एक स्थान नहीं, बल्कि यादों, संघर्ष और बिछड़ने की कहानी है।

उनकी यह बातचीत सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बनी हुई है। कई लोगों ने इसे एक व्यक्तिगत अनुभव के रूप में देखा, जबकि कुछ ने इसे कश्मीर के इतिहास और वहां के विभिन्न समुदायों के अनुभवों को समझने का अवसर बताया। समय रैना की कहानी यह भी दिखाती है कि हिंसा और संघर्ष के दौर में जहां एक ओर कई परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ा, वहीं दूसरी ओर इंसानियत की मिसाल पेश करने वाले लोग भी सामने आए, जिन्होंने संकट की घड़ी में दूसरों की मदद की।

 

 

 

 

Related posts

सैफ अली खान और अक्षय कुमार 18 साल बाद साथ, ‘हैवान’ में पहली बार दिखेगा खतरनाक टकराव

80 के दशक में ऐसी दिखतीं कीआरा आडवाणी और सिद्धार्थ मल्होत्रा की जोड़ी? AI तस्वीर ने मचाई धूम

कनाडा में अम्मी विर्क के काफिले पर फायरिंग की खबर, कॉन्सर्ट के बाद SUV सवारों ने चलाईं गोलियां

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Read More