भारतीय रिजर्व बैंक के नए विदेशी मुद्रा नियमों के बाद सोमवार को रुपये में जोरदार तेजी आई। रुपया डॉलर के मुकाबले 95.76 पर खुला। जानें RBI के फैसलों का विदेशी मुद्रा बाजार, आयातकों और तेल कंपनियों पर क्या असर पड़ सकता है।
सोमवार को भारतीय मुद्रा बाजार में रुपये ने शानदार शुरुआत की। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया बाजार खुलते ही 1 प्रतिशत से ज्यादा मजबूत हो गया। रुपये में आई इस तेजी के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के विदेशी मुद्रा बाजार से जुड़े नए नियमों को अहम वजह माना जा रहा है। केंद्रीय बैंक ने डॉलर की मांग को नियंत्रित करने और विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने के लिए कई कदम उठाए हैं। इसके साथ ही तेल विपणन कंपनियों के लिए डॉलर खरीदने की अलग व्यवस्था भी बनाई गई है। इन फैसलों का असर बाजार में डॉलर की मांग और रुपये की चाल पर दिखाई देने लगा है।
डॉलर के मुकाबले 95.76 पर खुला रुपया
सोमवार को कारोबार की शुरुआत में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.76 के स्तर पर खुला। इससे पहले शुक्रवार को कारोबार समाप्त होने पर रुपया 96.73 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। इस तरह पिछले बंद स्तर की तुलना में रुपये में करीब 1 प्रतिशत की मजबूती दर्ज की गई। विदेशी मुद्रा बाजार में यह तेजी ऐसे समय देखने को मिली है, जब डॉलर की मांग और रुपये पर दबाव को लेकर बाजार में चिंता बनी हुई थी। रुपये का मजबूत होना भारतीय मुद्रा बाजार के लिए राहत की खबर माना जा रहा है। हालांकि, मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव कई घरेलू और वैश्विक कारकों पर निर्भर करता है। इसलिए आगे रुपये की चाल कैसी रहेगी, यह RBI के कदमों के प्रभाव के साथ-साथ कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेश और वैश्विक डॉलर की मांग पर भी निर्भर करेगा।
RBI ने विदेशी मुद्रा बाजार के नियम क्यों सख्त किए?
भारतीय रिजर्व बैंक ने शनिवार को विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव से जुड़े नियमों में बदलाव किए। इन बदलावों का प्रमुख उद्देश्य रुपये पर दबाव बढ़ाने वाली डॉलर की वायदा मांग को नियंत्रित करना और बाजार में सट्टेबाजी को सीमित करना है। विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव ऐसे वित्तीय अनुबंध होते हैं, जिनका इस्तेमाल कंपनियां और वित्तीय संस्थान भविष्य में होने वाले मुद्रा विनिमय के जोखिम से बचने के लिए कर सकते हैं। हालांकि, इनका इस्तेमाल बाजार में संभावित उतार-चढ़ाव पर दांव लगाने के लिए भी किया जा सकता है।
नए नियमों के तहत रद्द किए गए रुपये से जुड़े कुछ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों को दोबारा बुक करने पर रोक लगाई गई है। इसके अलावा, वास्तविक कारोबारी जरूरत से जुड़े प्रमाण के बिना किए जाने वाले कुछ लेनदेन की सीमा भी घटाई गई है। केंद्रीय बैंक ने कुछ विदेशी मुद्रा अनुबंधों के संबंध में बैंकों को 20 प्रतिशत नकद राशि अलग रखने का निर्देश दिया है। इससे कुछ प्रकार की वायदा डॉलर खरीद की लागत बढ़ सकती है और बाजार में अनावश्यक लेनदेन को हतोत्साहित किया जा सकता है।
डॉलर की वायदा खरीद महंगी होने से क्या बदलेगा?
विदेशी मुद्रा बाजार में कंपनियां भविष्य में होने वाले डॉलर भुगतान के जोखिम को कम करने के लिए वायदा अनुबंधों का सहारा लेती हैं। उदाहरण के लिए, किसी भारतीय कंपनी को आने वाले समय में विदेश से सामान खरीदने के लिए डॉलर में भुगतान करना है, तो वह विनिमय दर में संभावित बदलाव से बचने के लिए पहले से व्यवस्था कर सकती है। इसे हेजिंग कहा जाता है।
RBI के नए नियमों के कारण कुछ प्रकार के विदेशी मुद्रा अनुबंधों में नकदी की जरूरत बढ़ सकती है और बार-बार अनुबंध बुक करने की गुंजाइश सीमित हो सकती है। इससे बाजार में डॉलर की वायदा मांग पर दबाव पड़ने की संभावना है। हालांकि, वास्तविक व्यापार से जुड़ी हेजिंग और सट्टेबाजी के बीच अंतर करना जरूरी है। नए नियमों का असर अलग-अलग कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर उनके लेनदेन की प्रकृति के अनुसार अलग हो सकता है।
तेल कंपनियों के लिए डॉलर खरीदने की अलग व्यवस्था
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। कच्चे तेल का भुगतान आम तौर पर अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। ऐसे में तेल आयात करने वाली कंपनियों को बड़ी मात्रा में डॉलर की जरूरत पड़ती है। जब बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है, तो रुपये पर दबाव आ सकता है।
इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए RBI ने तेल विपणन कंपनियों को केंद्रीय बैंक से सीधे डॉलर खरीदने के लिए विशेष व्यवस्था उपलब्ध कराई है। इसका उद्देश्य तेल कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों को सामान्य विदेशी मुद्रा बाजार से अलग तरीके से पूरा करना है, ताकि बाजार में अचानक बढ़ने वाली मांग का दबाव कम किया जा सके। यदि यह व्यवस्था प्रभावी रहती है, तो सामान्य बाजार में डॉलर की मांग को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर तेल कंपनियों की जरूरतों और इस व्यवस्था के इस्तेमाल पर निर्भर करेगा।
आम लोगों और कारोबार पर क्या होगा असर?
रुपये में मजबूती का असर अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों पर पड़ सकता है। यदि रुपये की मजबूती बनी रहती है, तो डॉलर में भुगतान करने वाले आयातकों के लिए कच्चा माल, मशीनरी और अन्य वस्तुएं खरीदना अपेक्षाकृत सस्ता हो सकता है। इससे कुछ कंपनियों की लागत घटने की संभावना रहती है। इसी तरह, विदेश यात्रा और विदेशी शिक्षा पर खर्च करने वाले लोगों को भी विनिमय दर से राहत मिल सकती है।
दूसरी ओर, डॉलर में कमाई करने वाले निर्यातकों को रुपये की मजबूती से मिलने वाला लाभ घट सकता है, क्योंकि विदेश से प्राप्त डॉलर को बदलने पर उन्हें पहले की तुलना में कम रुपये मिल सकते हैं। हालांकि, वास्तविक प्रभाव संबंधित कारोबार, अनुबंधों और विनिमय दर में होने वाले बदलाव पर निर्भर करेगा।
आगे रुपये की चाल किन कारकों पर निर्भर करेगी?
RBI के नए कदमों से विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग और वायदा कारोबार के तौर-तरीकों में बदलाव आ सकता है। फिर भी रुपये की मजबूती लंबे समय तक बनी रहेगी या नहीं, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा। कच्चे तेल की कीमतें, भारत का आयात बिल, विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां और अमेरिकी डॉलर की अंतरराष्ट्रीय स्थिति रुपये की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
फिलहाल, RBI के फैसलों के बाद रुपये में आई तेजी बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। लेकिन इसे स्थायी सुधार मानने से पहले आने वाले कारोबारी सत्रों में मुद्रा की चाल पर नजर रखना जरूरी होगा।