संसद के मॉनसून सत्र में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ बिल नहीं आएगा। सरकार का फोकस महिला आरक्षण और परिसीमन (Delimitation) बिल पर है, जिसका दक्षिण भारतीय पार्टियां विरोध कर रही हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सोमवार से शुरू हो रहे संसद के मॉनसून सत्रमॉनसून सत्र में बहुचर्चित ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (एक देश, एक चुनाव) बिल पेश नहीं किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इस महत्वाकांक्षी योजना को लागू करने के लिए अभी पर्याप्त समय है। चूंकि इसका मुख्य लक्ष्य साल 2029 के आम चुनाव हैं, जिसमें अभी लगभग 3 साल का वक्त बचा है, इसलिए सरकार इस पर जल्दबाजी करने के मूड में नहीं है। फिलहाल सरकार का पूरा ध्यान अन्य प्राथमिकताओं पर केंद्रित है।
महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर फोकस
इस सत्र में सरकार का मुख्य फोकस महिला आरक्षण और परिसीमन (डिलिमिटेशन) बिल पर रहने वाला है। हालांकि, परिसीमन बिल इस सत्र में पेश होगा या नहीं, इस पर अगले एक-दो दिनों में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होने की उम्मीद है। इस विषय पर रणनीति बनाने के लिए शुक्रवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में ‘ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स’ (मंत्रियों के समूह) की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। इस बैठक में गृह मंत्री अमित शाह, शिवराज सिंह चौहान और किरण रिजिजू के अलावा सहयोगी दलों के नेता जैसे जेडीयू के ललन सिंह, टीडीपी के राम मोहन नायडू और आरएलडी के जयंत चौधरी भी शामिल हुए। सरकार को भरोसा है कि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों पर कई विपक्षी दल भी सरकार के साथ आ सकते हैं, जिससे मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस मुद्दे पर अलग-थलग पड़ सकती है।
विपक्ष की घेराबंदी और डीएमके की रणनीति
दूसरी तरफ, विपक्षी पार्टियां भी सरकार को घेरने के लिए अपनी रणनीति तैयार कर रही हैं। डीएमके (DMK) के अध्यक्ष और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने लंदन से ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी पार्टी के नेताओं के साथ इस सत्र को लेकर चर्चा की। बैठक के बाद डीएमके नेताओं ने साफ कर दिया कि यदि परिसीमन बिल अपने मौजूदा प्रारूप में ही पेश किया जाता है, तो पार्टी इसका पुरजोर विरोध करेगी। डीएमके नेता सरवनन अन्नादुरई का कहना है कि वर्तमान प्रारूप में यह बिल तमिलनाडु और अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों के खिलाफ है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में इस पर कोई सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है, लेकिन अगर तमिलनाडु को नुकसान हुआ तो डीएमके पीछे नहीं हटेगी।
दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएं और क्षेत्रीय असंतुलन का खतरा
परिसीमन बिल का सबसे तीव्र विरोध दक्षिण भारत की क्षेत्रीय पार्टियों और नेताओं की ओर से देखने को मिल रहा है। दक्षिण भारत के पांच राज्यों के नेताओं को डर है कि जनसंख्या के आधार पर होने वाले परिसीमन से उनकी लोकसभा सीटों की संख्या कम हो सकती है, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों की सीटें बढ़ जाएंगी। तमिलनाडु की शिवगंगा सीट से कांग्रेस सांसद कार्ती चिदंबरम ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि इस बिल से उत्तर और दक्षिण भारत के बीच का राजनीतिक व सामाजिक अंतर (गैप) और ज्यादा बढ़ जाएगा।
संसद की कार्यवाहियों पर पड़ने वाला व्यावहारिक असर
सीटों की संख्या बढ़ने से पैदा होने वाली व्यावहारिक समस्याओं की ओर इशारा करते हुए कार्ती चिदंबरम ने एक और महत्वपूर्ण पहलू उठाया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में लोकसभा में 543 सांसद हैं, और इतने में भी बहुत कम सांसदों को संसद में अपनी बात रखने या बोलने का पर्याप्त अवसर मिल पाता है। यदि परिसीमन के बाद सीटों की संख्या बढ़कर साढ़े आठ सौ (850) के पार हो जाती है, तो संसद का प्रबंधन और अधिक जटिल हो जाएगा। ऐसी स्थिति में अधिकांश सांसद संसद के भीतर सिर्फ ‘मूक दर्शक’ बनकर रह जाएंगे, जिससे लोकतांत्रिक बहसों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। कुल मिलाकर, आगामी मॉनसून सत्र बेहद हंगामेदार रहने के आसार हैं, जहां प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय संतुलन को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिल सकती है।