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पद्मिनी एकादशी केवल अधिक मास में आती है। जानिए संतान सुख और मोक्ष प्राप्ति के लिए इस एकादशी का शुभ मुहूर्त, व्रत कथा और पूजा करने का सही तरीका।
पद्मिनी एकादशी (Padmini Ekadashi) हिंदू धर्म में एक अत्यंत दुर्लभ और प्रभावशाली एकादशी मानी जाती है। यह एकादशी हर साल नहीं आती, बल्कि केवल ‘अधिक मास’ (पुरुषोत्तम मास या मलमास) में आती है, जो हर तीन साल में एक बार आता है। इस एकादशी को ‘पुरुषोत्तम एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है।
पद्मिनी एकादशी का महत्व
अधिक मास भगवान विष्णु का प्रिय महीना है, और इस दौरान आने वाली एकादशी का फल अन्य सामान्य एकादशियों से कई गुना अधिक होता है।
- पुण्य फल: इस व्रत को करने से व्यक्ति को कई वर्षों की तपस्या और यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है।
- मोक्ष की प्राप्ति: जो भक्त निष्काम भाव से यह व्रत रखते हैं, उन्हें अंत में वैकुंठ लोक (भगवान विष्णु के धाम) की प्राप्ति होती है।
- इच्छा पूर्ति: संतान सुख और खोई हुई खुशियों को वापस पाने के लिए यह व्रत अचूक माना जाता है।
पूजा विधि (Step-by-Step)
पद्मिनी एकादशी का व्रत दशमी तिथि से ही शुरू हो जाता है।
- दशमी का नियम: दशमी तिथि की शाम को सात्विक भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। कांसा, मांस, मसूर की दाल और शहद का सेवन वर्जित है।
- स्नान और संकल्प: एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। फिर भगवान विष्णु के समक्ष हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
- भगवान विष्णु का अभिषेक: भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र को गंगाजल और दूध से अभिषेक कराएं। उन्हें पीले वस्त्र, पीले फूल, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें।
- अखंड दीप: यदि संभव हो तो भगवान के सामने अखंड दीपक जलाएं और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- व्रत कथा: एकादशी की पौराणिक कथा का श्रवण या पठन जरूर करें, इसके बिना व्रत पूर्ण नहीं माना जाता।
- जागरण: इस व्रत में रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। रात में कीर्तन और भजन करना चाहिए।
पद्मिनी एकादशी व्रत कथा (संक्षेप में)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेतायुग में महिष्मती पुरी के राजा कृतवीर्य की कई रानियां थीं, लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए राजा और उनकी रानी पद्मिनी ने कठोर तपस्या की। तब देवी अनसूया ने रानी पद्मिनी को ‘अधिक मास’ की शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। रानी ने विधि-विधान से यह व्रत किया, जिसके प्रभाव से भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्हें तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया। इसी के फलस्वरूप कार्तवीर्य अर्जुन जैसे शक्तिशाली पुत्र का जन्म हुआ।
पारण के नियम
व्रत का समापन अगले दिन (द्वादशी) को सूर्योदय के बाद पारण के समय किया जाता है। पारण से पहले ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान-पुण्य करना अत्यंत शुभ होता है।