आयरलैंड के खिलाफ भारत की हार पर मनोज तिवारी का तीखा प्रहार। PR एजेंसियों, श्रेयस अय्यर की कप्तानी और वैभव सूर्यवंशी के सिलेक्शन पर उठाये सवाल।
भारतीय क्रिकेट टीम का आयरलैंड दौरा न केवल एक ऐतिहासिक हार के रूप में याद रखा जाएगा, बल्कि यह भारतीय क्रिकेट के अंदरूनी तंत्र और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर गया है। पूर्व क्रिकेटर मनोज तिवारी ने इस हार के बाद टीम प्रबंधन और चयन प्रक्रिया को लेकर जो टिप्पणी की है, वह क्रिकेट जगत में चर्चा का विषय बन गई है। तिवारी का मानना है कि आयरलैंड के खिलाफ सीरीज हार कोई छोटी घटना नहीं है और इस पर जवाबदेही तय होनी चाहिए, न कि इसका दोष केवल कप्तान पर मढ़ दिया जाना चाहिए।
‘जवाबदेही’ और ‘PR’ का खेल
मनोज तिवारी का तर्क बहुत स्पष्ट है। उन्होंने आरोप लगाया है कि भारतीय टीम के ‘निर्णय लेने वाले’ (decision makers) लोग अक्सर अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए ‘PR एजेंसियों’ का सहारा लेते हैं। तिवारी को डर है कि अब सारा दोष कप्तान श्रेयस अय्यर पर डाल दिया जाएगा, ताकि वास्तविक जिम्मेदार लोग अपनी जवाबदेही से बच सकें। उनका कहना है कि यदि भारत इंग्लैंड के खिलाफ आगामी सीरीज जीत भी जाता है या भविष्य में दक्षिण अफ्रीका में होने वाला वर्ल्ड कप जीत भी जाता है, तो भी आयरलैंड में मिली हार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तिवारी का ‘हाथी को कमरे में संबोधित करने’ (address the elephant in the room) वाला मुहावरा इसी ओर इशारा करता है कि जो मुख्य समस्या है, उस पर कोई भी खुलकर बात करने को तैयार नहीं है।
वैभव सूर्यवंशी और नजरअंदाज की गई प्रतिभा
इस पूरी सीरीज में जिस एक खिलाड़ी को सबसे ज्यादा चर्चा मिली, वह थे युवा वैभव सूर्यवंशी। आईपीएल 2026 में अपने तूफानी प्रदर्शन के बाद माना जा रहा था कि आयरलैंड दौरा उनके लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण करने का सबसे अच्छा मौका है। हालांकि, टीम प्रबंधन ने अपनी पुरानी ओपनिंग जोड़ी पर ही भरोसा जताया। यह निर्णय न केवल प्रशंसकों के लिए बल्कि कई विशेषज्ञों के लिए भी निराशाजनक रहा। मनोज तिवारी का मानना है कि यदि भविष्य की टीम बनानी है, तो ऐसी सीरीज में युवाओं को मौका देना अनिवार्य है। बेंच पर बैठे वैभव सूर्यवंशी का उदाहरण यह दिखाता है कि टीम प्रबंधन कहीं न कहीं अपनी ‘सुरक्षित’ रणनीति के जाल में फंस गया है।
क्या इंग्लैंड दौरा बनेगा सुधार का जरिया?
भारत अब इंग्लैंड के खिलाफ पांच टी20 और तीन वनडे मैचों की सीरीज के लिए तैयार है। यह दौरा भारतीय टीम के लिए अग्नि परीक्षा जैसा है। आयरलैंड में मिली हार ने टीम के आत्मविश्वास और चयन नीतियों को हिलाकर रख दिया है। इंग्लैंड जैसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ, जहां स्थितियां और भी कठिन होंगी, भारतीय टीम को न केवल तकनीकी रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी मजबूत होना होगा। मनोज तिवारी की चिंता यह है कि यदि इंग्लैंड सीरीज में भी परिणाम पक्ष में नहीं रहे, तो क्या प्रबंधन अपनी गलतियों को स्वीकार करेगा या फिर किसी नए ‘बलि का बकरा’ (scapegoat) को ढूंढा जाएगा?
पारदर्शिता की आवश्यकता
भारतीय क्रिकेट में इस तरह के आरोप पहली बार नहीं लगे हैं। पारदर्शिता और स्पष्टता किसी भी सफल खेल संस्था की नींव होती है। यदि चयन प्रक्रिया में कोई स्पष्टता नहीं है, तो खिलाड़ियों का मनोबल गिरना स्वाभाविक है। मनोज तिवारी का यह बयान कि “कोई भी मेरी बातों पर विश्वास नहीं कर रहा था”, यह दर्शाता है कि भारतीय क्रिकेट के गलियारों में कई ऐसे मुद्दे हैं जो दबे हुए हैं। अब समय आ गया है कि टीम प्रबंधन खुले मन से अपनी नीतियों की समीक्षा करे।
अंत में, आयरलैंड के खिलाफ हार एक ‘वेक-अप कॉल’ (चेतावनी) होनी चाहिए। इसे मात्र एक सीरीज हार के रूप में न देखकर, इसे टीम की उन खामियों के रूप में देखा जाना चाहिए जिन्हें लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा है। श्रेयस अय्यर को कप्तान के रूप में सुधार करने की जरूरत हो सकती है, लेकिन पूरी हार का दोष केवल उन पर डालना अनुचित है। भारतीय टीम को सामूहिक रूप से इस हार की जिम्मेदारी लेनी होगी। इंग्लैंड दौरा इस बात का जवाब देगा कि क्या टीम प्रबंधन वास्तव में विकास की राह पर है या वे केवल अपनी पुरानी गलतियों को दोहरा रहे हैं।