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भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। जानिए कैसे मोहिनी रूप धारण कर विष्णु जी ने अमृत की रक्षा की और भस्मासुर का वध किया।
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान विष्णु के 24 अवतारों में ‘मोहिनी अवतार’ एकमात्र स्त्री अवतार है। यह अवतार भगवान विष्णु ने किसी राक्षस का वध करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी माया और सौंदर्य से असुरों को भ्रमित कर ‘अमृत’ की रक्षा करने और संसार में संतुलन बनाए रखने के लिए लिया था।
भगवान विष्णु द्वारा मोहिनी रूप धारण करने के पीछे मुख्य रूप से दो प्रमुख पौराणिक कथाएं प्रसिद्ध हैं:
1. समुद्र मंथन और अमृत की रक्षा
मोहिनी अवतार की सबसे प्रमुख कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र का मंथन किया, तो उसमें से ‘अमृत कलश’ निकला। अमृत पीकर असुर अमर होना चाहते थे, ताकि वे देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर स्थायी अधिकार कर सकें।
- असुरों का छल: असुरों ने बलपूर्वक देवताओं से अमृत कलश छीन लिया। यदि असुर अमृत पी लेते, तो सृष्टि में अधर्म का बोलबाला हो जाता।
- मोहिनी का आगमन: देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने एक अत्यंत सुंदर स्त्री ‘मोहिनी’ का रूप धारण किया। उनकी सुंदरता देखकर असुर उन पर मोहित हो गए और अमृत का बंटवारा करने का निर्णय मोहिनी को सौंप दिया।
- देवताओं को अमृत: मोहिनी ने चतुराई से असुरों को अपनी मीठी बातों और नृत्य में उलझाए रखा और सारा अमृत देवताओं को पिला दिया। इस प्रकार, विष्णु जी ने मोहिनी अवतार लेकर धर्म की रक्षा की।
2. भस्मासुर का वध
मोहिनी अवतार की दूसरी महत्वपूर्ण कथा भस्मासुर नामक राक्षस से जुड़ी है। भस्मासुर ने भगवान शिव की तपस्या कर यह वरदान प्राप्त किया था कि वह जिसके भी सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा।
- वरदान का दुरुपयोग: वरदान मिलते ही भस्मासुर स्वयं भगवान शिव को भस्म करने के लिए उनके पीछे दौड़ पड़ा।
- विष्णु जी की युक्ति: महादेव की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धरा और भस्मासुर के मार्ग में आ गए। मोहिनी के रूप को देखकर भस्मासुर सब कुछ भूल गया और उनके साथ नृत्य करने की इच्छा जताई।
- अहंकार का अंत: नृत्य के दौरान मोहिनी ने अपना हाथ अपने सिर पर रखा। उसकी नकल करते हुए मदहोश भस्मासुर ने जैसे ही अपना हाथ अपने सिर पर रखा, वह अपने ही वरदान से भस्म हो गया।
मोहिनी अवतार का आध्यात्मिक महत्व
मोहिनी शब्द का अर्थ है ‘मोहित करने वाली’। यह अवतार इस बात का प्रतीक है कि ‘माया’ कितनी शक्तिशाली हो सकती है। भगवान विष्णु ने दिखाया कि जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों और वासनाओं के वश में होता है (जैसे असुर), वह सत्य को नहीं देख पाता और अंततः अपना विनाश कर लेता है। वहीं, जो धर्म के मार्ग पर चलते हैं, ईश्वर स्वयं उनकी रक्षा करते हैं।