लैंसेट की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में ‘एक्सेस’ श्रेणी की जगह ‘वॉच’ श्रेणी की ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स का अनियंत्रित उपयोग हो रहा है। यह प्रथा एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) को बढ़ावा दे रही है।
यदि आपको कभी गले में खराश या यूरीन इन्फेक्शन (UTI) जैसी सामान्य बीमारी के लिए एंटीबायोटिक (Antibiotics) दी गई है, तो आपको लगा होगा कि यह बिल्कुल सही इलाज है। लेकिन प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट रीजनेबल हेल्थ – साउथईस्ट एशिया’ (The Lancet Regional Health – Southeast Asia) में प्रकाशित एक अध्ययन ने भारत में एंटीबायोटिक दवाओं के अनियंत्रित और गलत इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई है।
शोध से पता चला है कि भारत में कुल एंटीबायोटिक खपत में कुछ गिरावट के बावजूद, अत्यधिक शक्तिशाली और व्यापक स्पेक्ट्रम वाली ‘वॉच’ (Watch) श्रेणी की एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री और डॉक्टरों द्वारा इन्हें लिखे जाने (Prescription) में तेजी से वृद्धि हुई है।
भारत में खपत का गणित: जरूरत से ज्यादा दवाएं
लैंसेट अध्ययन में पहली बार एक ऐसा वैश्विक ढांचा पेश किया गया है जो किसी देश में बीमारियों के पैटर्न और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) के स्तर के आधार पर एंटीबायोटिक की सही खपत का अनुमान लगाता है।
- आदर्श खपत: भारत की जरूरतों के हिसाब से प्रति 1,000 लोगों पर आदर्श दैनिक खपत 14.7 DID (डिफाइंड डेली डोज) होनी चाहिए।
- वास्तविक खपत: वर्तमान में भारत में यह खपत 18.3 DID है।
चिंता की बात केवल ज्यादा खुराक नहीं है, बल्कि इस खपत में ‘पहुंच’ (Access) वाली साधारण दवाओं के बजाय भारी और मजबूत दवाओं का बढ़ता दबदबा है।
क्या हैं ‘वॉच’ (Watch) एंटीबायोटिक्स? (WHO का AWaRe वर्गीकरण)
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एंटीबायोटिक दवाओं के जिम्मेदार उपयोग के लिए उन्हें AWaRe (Access, Watch, Reserve) श्रेणी में विभाजित किया है:
- 1. एक्सेस (Access): ये आम संक्रमणों के इलाज के लिए पहली पसंद वाली दवाएं हैं। इनसे रेजिस्टेंस का खतरा सबसे कम होता है। आदर्श रूप से 60% से अधिक इस्तेमाल इन्हीं का होना चाहिए, लेकिन भारत में यह आंकड़ा केवल 27% है।
- 2. वॉच (Watch): ये ब्रॉड-स्पेक्ट्रम दवाएं हैं जिनका उपयोग बहुत संभलकर और केवल तभी किया जाना चाहिए जब साधारण दवाएं असर न करें। भारत में सबसे ज्यादा इन्हीं दवाओं को लिखा जा रहा है।
- 3. रिजर्व (Reserve): ये दवाएं बेहद खतरनाक और अन्य दवाओं से न ठीक होने वाले बैक्टीरिया (Multidrug-resistant infections) के लिए आखिरी हथियार होती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब हम मामूली सर्दी या गले में दर्द के लिए भी ‘वॉच’ श्रेणी की मजबूत दवाएं खा लेते हैं, तो भविष्य में गंभीर बीमारी होने पर ये दवाएं शरीर पर असर करना बंद कर देती हैं।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (AMR) भारत के लिए बड़ा खतरा क्यों है?
एंटीबायोटिक दवाएं शरीर में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को मारकर या उन्हें बढ़ने से रोककर काम करती हैं। जब इन दवाओं का बार-बार या गलत इस्तेमाल होता है, तो बैक्टीरिया खुद को बचाना सीख लेते हैं और समय के साथ दवा-प्रतिरोधी (Drug-Resistant) बन जाते हैं।
- एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) के कारण:
- अस्पताल में लंबे समय तक भर्ती रहना पड़ता है और इलाज का खर्च कई गुना बढ़ जाता है।
- साधारण संक्रमण भी जानलेवा रूप ले लेते हैं।
सर्जरी, कैंसर की कीमोथेरेपी और ऑर्गन ट्रांसप्लांट जैसी जटिल प्रक्रियाओं में संक्रमण से बचाव मुश्किल हो जाता है।
एंटीबायोटिक दवाओं के दुरुपयोग के मुख्य कारण
अध्ययन के अनुसार, भारत में अस्पतालों में भर्ती होने वाले लगभग 75% मरीजों को एंटीबायोटिक दी जाती है, लेकिन इनमें से केवल 6% मामलों में ही लैब टेस्ट (Microbiological testing) कराया जाता है।
- एंटीबायोटिक के गलत इस्तेमाल के प्रमुख कारण हैं:
- बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से दवाएं (Self-medication) लेना।
- वायरल बीमारियों (जैसे सामान्य सर्दी, जुकाम या फ्लू) में एंटीबायोटिक खाना, जहाँ इनका कोई असर नहीं होता।
- थोड़ा आराम मिलते ही दवा का कोर्स बीच में ही छोड़ देना।
पर्चे (Prescription) के बिना मेडिकल स्टोर से आसानी से एंटीबायोटिक मिल जाना।
एंटीबायोटिक का जिम्मेदारी से उपयोग कैसे करें?
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) के खतरे को कम करने के लिए डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने कुछ बेहद आसान लेकिन महत्वपूर्ण सावधानियां सुझाई हैं:
- केवल डॉक्टर की सलाह पर लें: किसी भी एंटीबायोटिक का सेवन किसी योग्य डॉक्टर के लिखे पर्चे पर ही करें।
- वायरल में न खाएं: सर्दी, खांसी, जुकाम और फ्लू में एंटीबायोटिक लेने की जिद न करें, क्योंकि ये वायरस से होते हैं बैक्टीरिया से नहीं।
- कोर्स पूरा करें: यदि डॉक्टर ने 5 दिन की दवा लिखी है, तो 2 दिन में ठीक महसूस होने पर भी पूरा कोर्स समाप्त करें।
- पुरानी दवा का प्रयोग न करें: घर में रखी पुरानी दवाइयों का इस्तेमाल न करें और न ही अपनी दवा किसी दूसरे मरीज को दें।