कोरियोग्राफर राजू खान ने फिल्म ‘लगान’ के मशहूर गाने ‘घनन घनन’ की शूटिंग की चुनौतियों को साझा किया। उन्होंने बताया कि कैसे बिना परछाइयों के इस गाने को सूर्यास्त के वक्त शूट किया गया।
आशुतोष गोवारिकर की कालजयी फिल्म ‘लगान’ (2001) का हर दृश्य आज भी दर्शकों के दिलों में ताजा है। फिल्म का सुपरहिट गाना “घनन घनन” न केवल अपनी धुन के लिए, बल्कि उस समय के फिल्मांकन के लिए भी चर्चा में रहा। हाल ही में, दिग्गज कोरियोग्राफर सरोज खान के बेटे और इस गाने के कोरियोग्राफर राजू खान ने इस गाने की शूटिंग के दौरान आई चुनौतियों और अपने संघर्षों को साझा किया है।
शूटिंग का तनाव और मुहूर्त का दिन
राजू खान ने याद करते हुए बताया कि ‘घनन घनन’ की शूटिंग बहुत ही तनावपूर्ण थी। उन्होंने कहा, “जब मैंने पहली बार सेट देखा, तो उसके अगले दिन ही हमें गाना शूट करना था। उस दिन फिल्म का मुहूर्त था। फिल्म का पहला शॉट वह था जब यशोदा मां (आमिर खान की मां का किरदार) सूखे कुएं से पानी निकालने की कोशिश करती हैं और फिर आसमान की तरफ देखकर बारिश की उम्मीद करती हैं।”
राजू के लिए चुनौती तब शुरू हुई जब उसी दिन उन्हें फिल्म का विशाल सेट दिखाया गया। उन्होंने पहली बार सेट पर ही वह गाना सुना और पूरी रात जागकर उसकी प्लानिंग की। उन्हें आज भी आश्चर्य है कि कैसे सब कुछ इतने कम समय में व्यवस्थित हो गया।
सेट की विशालता और रोशनी की चुनौती
इस गाने को शूट करने में लगभग आठ दिन का समय लगा, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती गाने के दूसरे हिस्से में आई, जहां बादलों को उमड़ते हुए दिखाना था। राजू बताते हैं, “वास्तव में बादल तो कहने पर नहीं आ सकते थे। इतने विशाल सेट को कवर करना लगभग असंभव था। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि ‘ओवरकास्ट’ (बादल छाए हुए) माहौल दिखाना था, जिसमें सूरज की परछाइयां (shadows) नहीं दिखनी चाहिए थीं।”
राजू ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल किया। उन्होंने शॉट को सीमित क्षेत्रों में इस तरह से डिजाइन किया कि अभिनेत्रियों के पैर न दिखें, क्योंकि इससे शॉट की निरंतरता (continuity) प्रभावित हो सकती थी। उन्होंने ज्यादा से ज्यादा लोगों को एक साथ फ्रेम में लेने की कोशिश की, ताकि गाना देखने में जीवंत और दिलचस्प लगे।
सूर्यास्त के 45 मिनट का ‘गोल्डन टाइम’
गाने के दूसरे भाग को शूट करने का अनुभव और भी चुनौतीपूर्ण था। राजू ने खुलासा किया, “अगर आप गाने का दूसरा हिस्सा ध्यान से देखेंगे, तो पाएंगे कि इसे लगभग सूर्यास्त के समय शूट किया गया था। जब सूरज पूरी तरह ढल जाता था, तब हमारे पास शूटिंग के लिए केवल 45 मिनट का समय होता था।”
यह वह समय था जब वातावरण में कोई सख्त परछाई नहीं होती थी और रोशनी बहुत ही नरम (diffused) होती थी। उस 45 मिनट की खिड़की में ही उन्हें बिना परछाइयों के सारे महत्वपूर्ण शॉट लेने पड़ते थे। यह एक बेहद कठिन काम था, जिसके लिए हर दिन पूरी टीम को घड़ी की सुइयों के साथ दौड़ना पड़ता था।
एक एपिक पीरियड ड्रामा: ‘लगान’ का प्रभाव
आशुतोष गोवारिकर द्वारा निर्देशित ‘लगान’ भारतीय सिनेमा की उन चुनिंदा फिल्मों में से है, जिसने वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई। 1893 के ब्रिटिश औपनिवेशिक काल पर आधारित यह फिल्म मध्य भारत के एक गांव की कहानी है, जो सूखे और भारी लगान (टैक्स) के बोझ तले दबी है। फिल्म का चरमोत्कर्ष एक क्रिकेट मैच है, जिसे गांव वाले एक अंग्रेज अफसर की चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं।
फिल्म में आमिर खान के साथ ग्रेसी सिंह, रेचल शेली और पॉल ब्लैकथॉर्न ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं। ‘घनन घनन’ गाना फिल्म की नींव रखने वाला वह दृश्य था, जिसने दर्शकों को फिल्म के माहौल में पूरी तरह डुबो दिया। राजू खान का यह खुलासा न केवल उनके पेशेवर संघर्षों को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि पर्दे पर दिखने वाला 4-5 मिनट का जादू बनाने के पीछे कितनी कड़ी मेहनत, प्लानिंग और धैर्य छिपा होता है।
आज इतने वर्षों बाद भी, जब हम इस गाने को देखते हैं, तो राजू खान के उन 45 मिनटों के संघर्ष और प्लानिंग की झलक हर शॉट में दिखाई देती है, जो इस गाने को भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक यादगार हिस्सा बनाती है।