ज्येष्ठ मास 2026: भीषण तपिश के बीच आध्यात्मिक शांति का मार्ग; जानें सूर्य और हनुमान जी की पूजा का खास महत्व

ज्येष्ठ मास 2026: भीषण तपिश के बीच आध्यात्मिक शांति का मार्ग; जानें सूर्य और हनुमान जी की पूजा का खास महत्व

ज्येष्ठ मास 2026 की शुरुआत 2 मई से हो रही है। जानें क्यों इस महीने में सूर्य उपासना और हनुमान जी की पूजा का विशेष फल मिलता है और क्या हैं इसके धार्मिक लाभ।

साल 2026 में 2 मई से ज्येष्ठ महीने का आगाज़ हो रहा है, जो 29 जून तक चलेगा। हिंदू धर्म में इस महीने को ‘तपस्या का मास’ कहा जाता है। मान्यता है कि इस दौरान किया गया दान और नियम न केवल स्वास्थ्य को बेहतर रखते हैं, बल्कि कुंडली के दोषों को भी शांत करते हैं।

सूर्य देव की उपासना: ऊर्जा और आत्मविश्वास का स्रोत

ज्येष्ठ मास में सूर्य अपनी राशि में सबसे अधिक बलवान और प्रचंड होते हैं। भविष्य पुराण में उल्लेख है कि इस समय सूर्य की उपासना करना सीधे तौर पर आरोग्य और ऐश्वर्य से जुड़ा है।

  • क्यों करें पूजा: सूर्य को ‘जगत की आत्मा’ माना गया है। सुबह जल्दी उठकर तांबे के लोटे से सूर्य को अर्घ्य देने से आँखों की रोशनी बढ़ती है और त्वचा संबंधी रोगों से मुक्ति मिलती है।
  • नेतृत्व क्षमता (Leadership Quality): ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जो व्यक्ति ज्येष्ठ मास में नियम से सूर्य देव की शरण में रहता है, उसके आत्मविश्वास में जबरदस्त वृद्धि होती है और समाज में उसका मान-सम्मान बढ़ता है।
  • सफलता का मार्ग: इस दौरान ‘आदित्य हृदय स्तोत्र’ का पाठ करना शत्रुओं पर विजय और कार्यों में सफलता दिलाने वाला माना गया है।

हनुमान जी और सूर्य देव: गुरु-शिष्य का अटूट रिश्ता

ज्येष्ठ मास में हनुमान जी की पूजा और ‘बड़ा मंगल’ (Budhwa Mangal) मनाने की परंपरा के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक रहस्य है।

  • शिक्षा का संबंध: वाल्मीकि रामायण के अनुसार, हनुमान जी ने सूर्य देव को अपना गुरु बनाया था। चूँकि ज्येष्ठ मास सूर्य का महीना है, इसलिए गुरु के प्रबल होने पर उनके प्रिय शिष्य हनुमान की पूजा करना अत्यंत फलदायी होता है।
  • मानसिक शक्ति: इस महीने हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का पाठ करने से भक्तों को साहस मिलता है और मानसिक व्याधियां दूर होती हैं। गुरु (सूर्य) और शिष्य (हनुमान) की संयुक्त कृपा से व्यक्ति हर कठिन परिस्थिति से लड़ने में सक्षम होता है।

ज्येष्ठ मास में ‘जल दान’ का महत्व

इस महीने में जल की बर्बादी को पाप और जल दान को महादान माना गया है। प्यासे राहगीरों को पानी पिलाना, पक्षियों के लिए परिंडे लगाना और मिट्टी के घड़े का दान करना अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल देता है।

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