जावेद अख्तर ने “प्रोपेगेंडा फिल्म” की परिभाषा को किया खारिज; फिल्म ‘धुरंधर’ विवाद के बीच फिल्म निर्माताओं का किया समर्थन

जावेद अख्तर ने "प्रोपेगेंडा फिल्म" की परिभाषा को किया खारिज; फिल्म 'धुरंधर' विवाद के बीच फिल्म निर्माताओं का किया समर्थन

दिग्गज लेखक जावेद अख्तर ने फिल्मों को ‘प्रोपेगेंडा’ कहे जाने पर असहमति जताई है। फिल्म ‘धुरंधर’ के विवाद के बीच उन्होंने कहा कि फिल्म निर्माताओं को अपना नजरिया पेश करने का हक है।

प्रोपेगेंडा लेबल पर जावेद अख्तर की असहमति

भारतीय सिनेमा के दिग्गज लेखक और गीतकार जावेद अख्तर एक बार फिर अपने बेबाक बयानों के कारण चर्चा में हैं। हाल ही में फिल्म जगत में “प्रोपेगेंडा फिल्मों” को लेकर चल रही तीखी बहस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अख्तर ने इस शब्द के इस्तेमाल पर असहमति जताई है। कोलकाता में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान जब उनसे फिल्मों पर लगने वाले प्रोपेगेंडा के लेबल के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे इस शब्द से इत्तेफाक नहीं रखते। अख्तर का मानना है कि किसी भी फिल्म को केवल इसलिए “प्रोपेगेंडा” करार देना गलत है क्योंकि वह एक विशिष्ट विचारधारा या दृष्टिकोण को दर्शाती है। उनके अनुसार, सिनेमा हमेशा से ही समाज और व्यक्तिगत सोच का प्रतिबिंब रहा है, और इसमें किसी नजरिए को पेश करना कोई गुनाह नहीं है।

फिल्म ‘धुरंधर’ और वर्तमान विवाद का संदर्भ

जावेद अख्तर की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब फिल्म ‘धुरंधर’ (Dhurandhar) को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा हो रही है। इस फिल्म पर भी आलोचकों द्वारा प्रोपेगेंडा फैलाने का आरोप लगाया गया है। इसी पृष्ठभूमि में अख्तर ने कहा कि एक फिल्म निर्माता के पास अपनी बात कहने और एक कहानी को अपने नजरिए से पर्दे पर उतारने की पूरी आजादी होनी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि यदि कोई फिल्म किसी विशेष विचार को प्रस्तुत करती है, तो यह दर्शकों पर निर्भर करता है कि वे उसे कैसे ग्रहण करते हैं। किसी फिल्म को खारिज करने के लिए उसे “प्रोपेगेंडा” का ठप्पा लगा देना रचनात्मक स्वतंत्रता के खिलाफ है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और फिल्म निर्माता का अधिकार

अख्तर ने कार्यक्रम में विस्तार से बात करते हुए कहा कि कला और सिनेमा का उद्देश्य ही अलग-अलग दृष्टिकोणों को सामने लाना है। उन्होंने कहा, “मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता कि कोई फिल्म निर्माता अपना नजरिया पेश कर रहा है। हर व्यक्ति की अपनी पसंद और नापसंद होती है, और एक कलाकार के रूप में उसे अपनी बात रखने का संवैधानिक अधिकार है।” उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इतिहास में ऐसी कई फिल्में रही हैं जिन्हें समय-समय पर विभिन्न वर्गों द्वारा प्रोपेगेंडा कहा गया, लेकिन अंततः वे सिनेमाई इतिहास का हिस्सा बनीं। उनके इस बयान ने फिल्म इंडस्ट्री के उन लोगों को एक नई मजबूती दी है जो अक्सर अपनी कहानियों के चयन के कारण आलोचनाओं का सामना करते हैं।

सिनेमा और समाज के बीच का संवाद

जावेद अख्तर ने यह भी स्पष्ट किया कि दर्शकों को शिक्षित करना या उन्हें एक विशेष दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करना फिल्म निर्माण का एक पुराना हिस्सा रहा है। चाहे वह सामाजिक कुरीतियों पर बनी फिल्में हों या देशभक्ति पर, हर फिल्म में एक संदेश छिपा होता है। उन्होंने कहा कि “प्रोपेगेंडा” शब्द का इस्तेमाल अक्सर तब किया जाता है जब फिल्म का संदेश किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत विचारधारा से मेल नहीं खाता। उनके इस बयान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सिनेमाई नैतिकता के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। कोलकाता के इस इवेंट में उनके तर्कों को सुनने के बाद, फिल्म जगत के जानकारों का मानना है कि ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों को देखने का नजरिया अब शायद थोड़ा बदलेगा।

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