शेयर बाजार में आज बड़ी गिरावट। जानिए क्यों गिरे सेंसेक्स और निफ्टी, ईरान-अमेरिका तनाव और कच्चे तेल के बढ़ते दामों का बाजार पर असर।
सोमवार, 29 जून 2026 को भारतीय शेयर बाजार ने एक कमजोर रुख दिखाया है। सुबह की सकारात्मक शुरुआत के बाद दोपहर तक आते-आते बाजार पर दबाव साफ देखा गया। दोपहर 1:29 बजे तक, बीएसई सेंसेक्स 347.79 अंकों की गिरावट के साथ 76,752.68 के स्तर पर कारोबार कर रहा था, जबकि निफ्टी 50 सूचकांक भी 93.20 अंकों की फिसलकर 23,962.80 पर आ गया। इस गिरावट के पीछे ऑटो, आईटी, बैंकिंग और तेल एवं गैस क्षेत्र के शेयरों में हुई व्यापक बिकवाली प्रमुख रही है। बाजार की अस्थिरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत VIX (Volatility Index) में 6% से अधिक का उछाल आया है, जो निवेशकों के बीच बढ़ती चिंता को दर्शाता है।
बाजार में चौतरफा बिकवाली: कौन से शेयर दबाव में हैं?
सेंसेक्स के बड़े शेयरों में गिरावट का नेतृत्व महिंद्रा एंड महिंद्रा, इंडिगो, मारुति सुजुकी, रिलायंस इंडस्ट्रीज, अल्ट्राटेक सीमेंट, भारतीय स्टेट बैंक, इन्फोसिस और भारती एयरटेल जैसे दिग्गजों ने किया। ऑटो सेक्टर सबसे अधिक प्रभावित रहा, जिसमें 2% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा मिडकैप आईटी, टेलीकॉम और पीएसयू बैंक इंडेक्स भी लाल निशान में रहे। हालांकि, ट्रेंट, पावर ग्रिड, एनटीपीसी, सन फार्मा और टाटा स्टील जैसे कुछ शेयरों ने बाजार को पूरी तरह गिरने से बचाने की कोशिश की, लेकिन बिकवाली का दबाव इतना अधिक था कि ये प्रयास नाकाफी साबित हुए।
ईरान-अमेरिका तनाव: बाजार की चिंता की मुख्य वजह
बाजार की गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण मध्य-पूर्व (Middle East) में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है। ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में शुरू हुई शत्रुता ने शांति की उम्मीदों को तोड़ दिया है। ईरान द्वारा कुवैत और बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले करने से वैश्विक स्तर पर डर का माहौल है। दूसरी ओर, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जो ऊर्जा आपूर्ति के लिए दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, वहां स्थिति लगातार नाजुक बनी हुई है। हालांकि मंगलवार को कतर में दोनों देशों के बीच बातचीत की खबरें हैं, लेकिन तब तक अनिश्चितता का यह बादल बाजार की धारणा को नकारात्मक बनाए हुए है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और भारत पर असर
तनाव बढ़ने के साथ ही कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें फिर से बढ़ गई हैं। WTI और ब्रेंट क्रूड ऑयल क्रमशः 69 डॉलर और 72 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गए हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में वृद्धि भारत के लिए दोहरी मार साबित होती है: यह न केवल देश के चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को बढ़ाती है, बल्कि मुद्रास्फीति (Inflation) के जोखिम को भी पैदा करती है, जो सीधे तौर पर कंपनियों के मुनाफे और बाजार को प्रभावित करता है।
एशियाई बाजारों की अस्थिरता और निवेशकों का मूड
एशियाई बाजार भी आज काफी उथल-पुथल वाले रहे। दक्षिण कोरिया का KOSPI सूचकांक 2% से अधिक नीचे कारोबार कर रहा था, जबकि ताइवान के बाजार ने विपरीत रुख दिखाते हुए बढ़त बनाए रखी। निवेशक एक तरफ एआई-आधारित वृद्धि के उत्साह और दूसरी तरफ बढ़ती लागत की चिंताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बाजार में यह ‘मिश्रित संकेत’ (Mixed Signals) निवेशकों को सतर्क कर रहे हैं, जिसका असर भारतीय बाजारों पर भी दिख रहा है।
आगे का रास्ता और निवेशकों के लिए सलाह
आज के सत्र में निफ्टी का 24,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे आना एक महत्वपूर्ण घटना है। जब तक भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं होते और कच्चे तेल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक बाजार में अस्थिरता बनी रहने की संभावना है। निवेशकों के लिए सलाह है कि वे घबराहट में कोई फैसला न लें। बाजार में ‘स्टॉप-लॉस’ का पालन करना अनिवार्य है, खासकर जब VIX में इतनी तेजी हो। लंबे समय के निवेशकों को बाजार की इस गिरावट को ‘अवसर’ के रूप में देखना चाहिए, जबकि इंट्राडे ट्रेडर्स को बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
अंत में, यह गिरावट इस बात की याद दिलाती है कि भारतीय शेयर बाजार वैश्विक घटनाओं से पूरी तरह अछूता नहीं है। मध्य-पूर्व में शांति की बहाली ही बाजार को वापस रफ्तार देने के लिए सबसे बड़ा उत्प्रेरक होगी। निवेशकों की निगाहें अब मंगलवार को कतर में होने वाली वार्ता के परिणामों पर टिकी होंगी, क्योंकि उसी से बाजार की अगली दिशा तय होगी।