WTO में भारत की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: चीन का घमंड टूटा, ड्रैगन ने बदले सुर; अब चाहता है भारत से मजबूत आर्थिक रिश्ते
नई दिल्ली/जिनेवा: अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मंच पर भारत ने एक बार फिर अपनी कूटनीतिक ताकत का लोहा मनवाया है। विश्व व्यापार संगठन (WTO) के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) में भारत के अडिग रुख के आगे चीन को झुकना पड़ा है। भारत ने न केवल चीन की एक बड़ी वैश्विक योजना को पटखनी दी, बल्कि अब चीन खुद भारत के साथ आर्थिक संबंधों को सुधारने की गुहार लगा रहा है।
भारत ने अकेले रोका चीन का ‘IFD’ समझौता
इस पूरे विवाद की जड़ चीन के नेतृत्व वाला ‘इनवेस्टमेंट फेसिलिटेशन फॉर डेवलपमेंट’ (IFD) समझौता था। चीन चाहता था कि इस समझौते को WTO के कानूनी ढांचे में शामिल कर लिया जाए। हालांकि, भारत इस मुद्दे पर अंत तक अकेला खड़ा रहा और अपने वीटो पावर का इस्तेमाल कर इसे रोक दिया। भारत का तर्क साफ था कि यह समझौता WTO के मूल सिद्धांतों और विकासशील देशों के हितों को कमजोर करेगा।
ड्रैगन के बदले सुर: व्यापार को बताया ‘संतुलनकारी तत्व’
भारत की इस ‘नो-कोम्प्रोमाईज़’ नीति के बाद चीन के रुख में अचानक नरमी देखी गई है। सम्मेलन के बाद चीन ने शुक्रवार को आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि वह भारत के साथ मिलकर द्विपक्षीय आर्थिक और व्यापारिक सहयोग बढ़ाने के लिए तैयार है। चीन ने अब व्यापार को दोनों देशों के बीच एक “ballast” (संतुलनकारी तत्व) के रूप में इस्तेमाल करने की इच्छा जताई है, ताकि आपसी तनाव को कम किया जा सके।
भारत की रणनीति: व्यापार में संतुलन और राष्ट्रीय हित
जहाँ चीन संबंधों को सुधारने की बात कर रहा है, वहीं भारत का रुख अभी भी सतर्कता भरा है। भारत सरकार का मुख्य फोकस व्यापार घाटे (Trade Deficit) को कम करने और द्विपक्षीय व्यापार को अधिक संतुलित बनाने पर है। भारत अब चीन के साथ केवल उन्हीं शर्तों पर व्यापार आगे बढ़ाना चाहता है जो देश की सुरक्षा और आर्थिक हितों के अनुकूल हों।