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ईस्टर की शुरुआत कैसे हुई? गुड फ्राइडे के तीसरे दिन ईसा मसीह के पुनर्जन्म की अद्भुत कहानी और ईस्टर संडे से जुड़ी परंपराओं के बारे में विस्तार से पढ़ें।
दुनिया भर में ईसाई समुदाय के लोग ईस्टर का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ईस्टर की शुरुआत कैसे हुई और क्यों इसे ‘संडे’ यानी रविवार को ही मनाया जाता है? आइए जानते हैं इस पवित्र दिन के पीछे की पूरी कहानी।
ईसा मसीह के पुनर्जन्म की कहानी
ईसाई मान्यताओं के अनुसार, आज से लगभग 2000 साल पहले प्रभु ईसा मसीह को यरूशलम में सूली पर चढ़ाया गया था। जिस दिन उन्हें सूली पर चढ़ाया गया, उसे ‘गुड फ्राइडे’ के रूप में याद किया जाता है। सूली पर चढ़ाए जाने के तीसरे दिन, यानी रविवार को ईसा मसीह फिर से जीवित हो उठे थे। उनके पुनर्जीवित होने की इसी खुशी में ईस्टर मनाया जाता है।
ईस्टर नाम की उत्पत्ति
‘ईस्टर’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर दो मुख्य मत हैं:
- ईओस्टर (Eostre): कई विद्वानों का मानना है कि यह नाम एंग्लो-सैक्सन वसंत की देवी ‘ईओस्टर’ के नाम पर पड़ा है, जिनकी पूजा वसंत ऋतु के आगमन पर की जाती थी।
- फसह (Passover): बाइबल के अनुसार, ईस्टर का संबंध यहूदी त्योहार ‘पासओवर’ से भी है, क्योंकि ईसा मसीह का पुनरुत्थान इसी समय के दौरान हुआ था।
संडे (रविवार) को ही क्यों मनाया जाता है ईस्टर?
ईस्टर की तारीख हर साल बदलती रहती है। सन 325 में ‘काउंसिल ऑफ नीसिया’ ने यह तय किया था कि ईस्टर हमेशा वसंत विषुव (Spring Equinox) के बाद आने वाली पहली पूर्णिमा के अगले रविवार को मनाया जाएगा। यही कारण है कि यह हमेशा 22 मार्च से 25 अप्रैल के बीच पड़ता है।
ईस्टर से जुड़ी खास परंपराएं
- ईस्टर एग्स (Eggs): ईस्टर पर अंडे सजाने की परंपरा बहुत पुरानी है। अंडा ‘नए जीवन’ और ‘प्रजनन क्षमता’ का प्रतीक माना जाता है, जो ईसा मसीह के पुनर्जन्म को दर्शाता है।
- ईस्टर बनी (Bunny): खरगोश को भी नए जीवन और वसंत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
- कैंडल लाइटिंग: चर्चों में मोमबत्तियां जलाई जाती हैं, जो ईसा मसीह को ‘दुनिया की रोशनी’ के रूप में प्रदर्शित करती हैं।