उज्जैन का हरसिद्धि माता मंदिर: जहां गिरी थी मां सती की कोहनी, जानें इस शक्तिपीठ का इतिहास और महत्व

उज्जैन का हरसिद्धि माता मंदिर: जहां गिरी थी मां सती की कोहनी, जानें इस शक्तिपीठ का इतिहास और महत्व

उज्जैन के हरसिद्धि माता मंदिर की कथा और महत्व जानें। 51 शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर में माता सती की कोहनी गिरी थी। जानें राजा विक्रमादित्य और दीप स्तंभों का इतिहास।

 

धार्मिक नगरी उज्जैन, जिसे ‘महाकाल की नगरी’ कहा जाता है, न केवल अपने ज्योतिर्लिंग के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह आदि शक्ति के पावन शक्तिपीठों का भी प्रमुख केंद्र है। महाकालेश्वर मंदिर के समीप और रुद्र सागर तालाब के किनारे स्थित हरसिद्धि माता मंदिर करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पूरे भारत में स्थापित 51 शक्तिपीठों में से हरसिद्धि माता का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

शक्तिपीठ की पौराणिक कथा

हिंदू धर्मग्रंथों और पुराणों के अनुसार, जब देवी सती ने अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर योग अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए थे, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे थे। सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 हिस्से कर दिए थे। मान्यता है कि उज्जैन के इस पावन स्थान पर माता सती की ‘बाईं कोहनी’ (Left Elbow) गिरी थी, जिसके कारण इसे एक जागृत शक्तिपीठ माना जाता है। यहाँ माता ‘हरसिद्धि’ के रूप में विराजमान हैं, जिसका अर्थ है— ‘हर कार्य में सिद्धि प्रदान करने वाली’।

राजा विक्रमादित्य की आराध्य देवी

हरसिद्धि माता मंदिर का संबंध उज्जैन के प्रतापी राजा विक्रमादित्य से भी जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि सम्राट विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के परम भक्त थे। पौराणिक कहानियों के अनुसार, राजा विक्रमादित्य ने माता को प्रसन्न करने के लिए 11 बार अपने मस्तक की बलि दी थी, लेकिन हर बार माता की कृपा से उन्हें नया मस्तक प्राप्त हो गया। मंदिर परिसर में आज भी राजा विक्रमादित्य की पूजा की जाती है और उनके बलिदान की गाथाएं भक्तों को सुनाई जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि माता की कृपा से ही विक्रमादित्य एक महान और न्यायप्रिय सम्राट बने थे।

मंदिर की अनूठी वास्तुकला और दीप स्तंभ

हरसिद्धि मंदिर की बनावट मराठा शैली और प्राचीन हिंदू स्थापत्य कला का मिश्रण है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर दो विशाल दीप स्तंभ स्थित हैं, जो इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता हैं। ये स्तंभ लगभग 51 फीट ऊंचे हैं और इनमें 1,011 दीप जलाए जाते हैं।

  • दीप प्रज्वलन का नजारा: विशेष अवसरों, विशेषकर नवरात्रि के दौरान, जब इन दोनों खंभों पर दीप जलाए जाते हैं, तो पूरे मंदिर परिसर का नजारा अलौकिक हो जाता है।
  • श्री यंत्र की स्थापना: गर्भगृह में माता हरसिद्धि की प्रतिमा के साथ-साथ महालक्ष्मी, महाकाली और सरस्वती की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। यहाँ गर्भगृह में ‘श्री यंत्र’ भी उत्कीर्ण है, जिसकी तांत्रिक महत्व से पूजा की जाती है।

नवरात्रि और धार्मिक महत्व

हरसिद्धि मंदिर में वर्ष भर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहाँ का वैभव देखने लायक होता है। नवरात्रि के नौ दिनों में मंदिर को फूलों और विशेष रोशनी से सजाया जाता है। श्रद्धालु दूर-दूर से यहाँ अपनी मन्नतें लेकर आते हैं। भक्तों का अटूट विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से यहाँ दर्शन करता है, माता उसके सभी दुखों को हर लेती हैं और उसे मनोवांछित फल (सिद्धि) प्रदान करती हैं।

कैसे पहुंचें?

उज्जैन रेल, सड़क और वायु मार्ग (इंदौर एयरपोर्ट के जरिए) से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। हरसिद्धि मंदिर महाकाल मंदिर से महज 500 मीटर की दूरी पर स्थित है, इसलिए श्रद्धालु आसानी से पैदल चलकर भी यहाँ पहुंच सकते हैं। यदि आप उज्जैन की यात्रा पर हैं, तो महाकाल के दर्शन के बाद शक्ति स्वरूपा हरसिद्धि माता के दर्शन करना अनिवार्य माना जाता है, क्योंकि शक्ति के बिना शिव की आराधना अधूरी मानी गई है।

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