गौरी व्रत 25 जुलाई से शुरू हो रहा है। जानें इस 5 दिवसीय पावन व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, कथा, जवारा रोपण का महत्व और नियम।
सनातन धर्म में आषाढ़ और श्रावण मास के दौरान कई प्रमुख व्रत और पर्व मनाए जाते हैं, जो विशेष रूप से माता पार्वती (देवी गौरी) और भगवान शिव को समर्पित होते हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत पवित्र और फलदायी व्रत है गौरी व्रत (Gauri Vrat)। गुजरात और भारत के कई पश्चिमी हिस्सों में इस व्रत का विशेष धार्मिक महत्व है।
यह व्रत मुख्य रूप से कुंवारी कन्याओं और महिलाओं द्वारा रखा जाता है। मान्यता है कि गौरी व्रत करने से कन्याओं को योग्य, मनचाहा और गुणवान वर की प्राप्ति होती है, वहीं विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य और सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मिलता है। 25 जुलाई से शुरू हो रहे इस पावन व्रत की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और महत्व के बारे में विस्तार से जानते हैं।
गौरी व्रत 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियां
गौरी व्रत हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि (देवशयनी एकादशी) से शुरू होकर आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) तक चलता है। यह व्रत कुल 5 दिनों तक नियम और निष्ठा के साथ रखा जाता है।
- व्रत प्रारंभ तिथि: 25 जुलाई (आषाढ़ शुक्ल एकादशी)
- व्रत समापन तिथि: 29 जुलाई (आषाढ़ पूर्णिमा / गुरु पूर्णिमा)
- पूजन का शुभ मुहूर्त: 25 जुलाई की सुबह 05:40 बजे से लेकर 08:25 बजे तक (प्रातःकाल पूजा हेतु) तथा संध्या काल में सूर्यास्त के समय 06:45 बजे से 07:30 बजे तक।
गौरी व्रत का धार्मिक महत्व (Significance of Gauri Vrat)
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या और व्रत किए थे। गौरी व्रत भी उसी तप और साधना का प्रतीक माना जाता है।
- मनचाहा जीवनसाथी: कुंवारी कन्याएं इस व्रत को निष्ठापूर्वक रखकर देवी गौरी से भगवान शिव जैसा शांत, दयालु और सर्वगुण संपन्न जीवनसाथी पाने की प्रार्थना करती हैं।
- अखंड सौभाग्य: विवाहित स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन में मधुरता बनाए रखने के लिए यह व्रत रखती हैं।
- जवारा (जौ के पौधे) रोपण का महत्व: इस व्रत के दौरान मिट्टी के पात्र में धान या जौ (जवारा) बोने की परंपरा है। यह जवारा समृद्धि, नए जीवन और हरी-भरी खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।
गौरी व्रत की पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
गौरी व्रत के 5 दिनों के दौरान पूजा-पाठ और नियमों का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसकी प्रामाणिक पूजा विधि निम्नलिखित है:
1. प्रथम दिन (जवारा रोपण):
- व्रत के पहले दिन (25 जुलाई) सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें।
- एक मिट्टी या पीतल के छोटे पात्र में पवित्र मिट्टी भरकर उसमें जौ या धान के बीज (जवारा) बोएं।
- इस पात्र को घर के पूजा स्थान पर स्थापित करें और प्रतिदिन इसमें जल अर्पित करें।
2. दैनिक पूजा और श्रृंगार:
जवारा पात्र के पास माता पार्वती और भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- देवी गौरी को लाल चुनरी, सिंदूर, अक्षत, धूप, दीप और फल-फूल अर्पित करें।
- माता पार्वती को सुहाग की सामग्री (बिंदी, चूड़ियां, मेहंदी आदि) चढ़ाएं।
- ‘ॐ गौरीशंकराय नमः’ या ‘ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः’ मंत्र का 108 बार जाप करें।
3. व्रत के नियम और खान-पान:
- इस व्रत के दौरान नमक का सेवन पूरी तरह से वर्जित होता है। इसे ‘अलोना व्रत’ (Unsalted Fast) भी कहा जाता है।
- व्रत रखने वाले केवल फल, दूध, मेवे (Dry Fruits) और सात्विक फलाहार का ही सेवन करते हैं।
- पांचों दिन मन में किसी के प्रति कटुता या क्रोध न लाएं और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
4. व्रत का उद्यापन और विसर्जन (पांचवें दिन):
- पांचवें दिन (गुरु पूर्णिमा) पूजा-पाठ के बाद पंडित या छोटी कन्याओं को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें।
- इसके पश्चात, बोए गए जवारा (जौ के पौधों) को किसी पवित्र नदी, तालाब या बहते जल में विसर्जित कर दें।
- विसर्जन के बाद नमक युक्त सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें।
गौरी व्रत के दौरान ध्यान रखने योग्य मुख्य बातें
- नमक से परहेज: इस व्रत का सबसे मुख्य नियम यह है कि 5 दिनों तक भोजन में किसी भी प्रकार के नमक (सामान्य या सेंधा) का प्रयोग न करें।
- साफ-सफाई और स्वच्छता: पूजा स्थल की स्वच्छता बनाए रखें और प्रतिदिन जवारा में स्वच्छ जल ही डालें।
- सकारात्मक सोच: व्रत के दौरान केवल शारीरिक उपवास ही नहीं, बल्कि विचारों में भी पवित्रता और भक्ति भाव बनाए रखना आवश्यक है।
25 जुलाई से शुरू हो रहा ‘गौरी व्रत’ आस्था, तपस्या और समर्पण का पावन पर्व है। जो भी भक्त, विशेषकर महिलाएं और कन्याएं, पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ देवी गौरी की पूजा-अर्चना करती हैं, माता पार्वती उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं और जीवन में सुख, शांति तथा सौभाग्य का वरदान देती हैं।