दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को ZEE5 से हटाए जाने के बाद पंजाब के गांवों, गुरुद्वारों और मैदानों में पब्लिक स्क्रीनिंग शुरू हो गई है। आम आदमी पार्टी (AAP) ने बैन को लेकर केंद्र पर निशाना साधा।
(Satluj) को ओटीटी प्लेटफॉर्म (ZEE5) से अचानक हटाए जाने के बाद पंजाब की राजनीति और सामाजिक गलियारों में आक्रोश फूट पड़ा है। आम आदमी पार्टी (AAP) ने इस कदम की कड़ी निंदा करते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। आम आदमी पार्टी के पंजाब मुख्य प्रवक्ता कुलदीप सिंह धालीवाल ने कहा कि बीजेपी की केंद्र सरकार सेंसरशिप के जरिए पंजाब के इतिहास और सच को दबाने की कोशिश कर रही है, लेकिन वह इसमें कभी कामयाब नहीं होगी। ‘आप’ ने स्पष्ट किया कि जब कोई कहानी जनता के दिलों से जुड़ जाती है, तो उसे इंटरनेट या किसी प्लेटफॉर्म से डिलीट करके मिटाया नहीं जा सकता।
गुरुद्वारों और खेल क्लबों ने संभाला मोर्चा: गांव-गांव हो रही हैं पब्लिक स्क्रीनिंग
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फिल्म पर पाबंदी लगाए जाने के बाद पंजाब के गांवों और कस्बों में एक अभूतपूर्व जमीनी आंदोलन (Grassroots Campaign) शुरू हो गया है। मोगा, संगरूर, पटियाला, अमृतसर, लुधियाना, गुरदासपुर, बरनाला, बठिंडा, होशियारपुर और राजपुरा समेत पंजाब के तमाम जिलों में फिल्म की कम्युनिटी स्क्रीनिंग (सामुदायिक प्रदर्शन) तेजी से रफ्तार पकड़ रही है।
अनेक गांवों में स्थिति यह है कि गुरुद्वारों के लाउडस्पीकरों से बकायदा मुनादी कराकर ग्रामीणों को शाम के वक्त फिल्म देखने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटियों, स्थानीय खेल क्लबों, सामाजिक संस्थाओं और युवाओं की टोलियों ने मिलकर इस बीड़े को उठाया है। वे खुद एलईडी स्क्रीन, प्रोजेक्टर, साउंड सिस्टम और बैठने की व्यवस्था कर रहे हैं, जहां सैकड़ों की संख्या में महिलाएं, बुजुर्ग और नौजवान इकट्ठा हो रहे हैं। इस मुहिम को विदेशों में रहने वाले पंजाबी प्रवासियों (Punjabi Diaspora) का भी भारी वित्तीय और नैतिक समर्थन मिल रहा है।
जसवंत सिंह खालरा का बलिदान पंजाब के इतिहास का वो सच है जिसे छुपाया नहीं जा सकता: AAP
आम आदमी पार्टी ने फिल्म की पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए कहा कि ‘सतलुज’ (जिसका पुराना नाम ‘पंजाब 95’ था) कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। यह मानव अधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा (Jaswant Singh Khalra) के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित है। खालरा ने 1980 और 1990 के दशक के दौरान पंजाब में आतंकवाद के काले दौर में कथित रूप से अवैध रूप से किए गए दाह-संस्कारों और गायब हुए लोगों (Enforced Disappearances) के दस्तावेजीकरण का ऐतिहासिक काम किया था। सितंबर 1995 में उनका अपहरण कर उनकी हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद लंबी अदालती लड़ाई में छह पुलिसकर्मियों को सजा भी हुई थी।
‘आप’ प्रवक्ता ने कहा कि यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज है। ऐसे में केंद्र सरकार किस ‘सुरक्षा चिंताओं’ का हवाला देकर इसे बैन कर रही है? सच को छुपाने की यह कोशिश पूरी तरह अलोकतांत्रिक है।
अकाली दल पर भी साधा निशाना: कहा- बंद कमरों की राजनीति छोड़ें
इस पूरे विवाद के बीच आम आदमी पार्टी ने शिरोमणि अकाली दल (SAD) को भी आड़े हाथों लिया। ‘आप’ प्रवक्ता कुलदीप सिंह धालीवाल ने आरोप लगाया कि एक तरफ सुखबीर सिंह बादल अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से इस फिल्म को पंजाब के कोने-कोने में दिखाने के लिए कह रहे हैं, तो दूसरी तरफ इतिहास गवाह है कि जब पंजाब की जनता पर जुल्म हो रहे थे, तब ये दल सत्ता की मलाई चाट रहे थे। ‘आप’ ने कहा कि पंजाब की जागरूक जनता अब इन राजनीतिक पैंतरेबाज़ियों को समझ चुकी है। आज पंजाब का आम नागरिक, किसान और युवा खुद आगे आकर बिना किसी राजनीतिक प्रभाव के गुरुद्वारों और खुले मैदानों में इस फिल्म को देख रहा है और अपने इतिहास से रूबरू हो रहा है।