Tiger Translocation: बिहार की बाघिन ने रचा इतिहास, पहली बार दूसरे राज्य के टाइगर रिजर्व पहुंची, जानें पूरी कहानी

Tiger Translocation: बिहार की बाघिन ने रचा इतिहास, पहली बार दूसरे राज्य के टाइगर रिजर्व पहुंची, जानें पूरी कहानी

 

बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व की बाघिन को पहली बार संरक्षण के उद्देश्य से पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व भेजा गया। भारतीय वायु सेना के विशेष विमान से हुआ स्थानांतरण।

बिहार के वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। वाल्मीकिनगर स्थित वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (VTR) की एक बाघिन को संरक्षण के उद्देश्य से पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित किया गया है। यह पहली बार है जब बिहार से किसी बाघ को दूसरे राज्य के टाइगर रिजर्व में संरक्षण कार्यक्रम के तहत भेजा गया है। इस ऐतिहासिक अभियान को बिहार और पश्चिम बंगाल वन विभाग, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और भारतीय वायु सेना के समन्वित प्रयासों से पूरा किया गया। बाघिन को पहले सुरक्षित तरीके से बेहोश किया गया, फिर उसकी स्वास्थ्य जांच और आवश्यक वन्यजीव प्रबंधन प्रक्रियाएं पूरी की गईं। इसके बाद उसे रेडियो-कॉलर लगाया गया और सड़क मार्ग से गोरखपुर हवाई अड्डे तक पहुंचाया गया। वहां से भारतीय वायु सेना के विशेष विमान के जरिए बक्सा टाइगर रिजर्व ले जाया गया।

29 सितंबर की शाम शुरू हुई स्थानांतरण प्रक्रिया

बाघिन के स्थानांतरण की प्रक्रिया 29 सितंबर की शाम करीब 5 बजे वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में शुरू हुई। वन्यजीव विशेषज्ञों और पशु चिकित्सकों की निगरानी में बाघिन को सफलतापूर्वक बेहोश किया गया। इसके बाद उसकी चिकित्सकीय जांच की गई और आवश्यक वन्यजीव प्रबंधन प्रक्रियाओं को पूरा किया गया। बाघिन की निगरानी के लिए उसके शरीर पर रेडियो-कॉलर भी लगाया गया। रेडियो-कॉलर वन्यजीव विशेषज्ञों को उसके स्थान, गतिविधियों और व्यवहार की निगरानी करने में मदद करेगा। इससे नए वातावरण में उसके अनुकूलन और आगे की गतिविधियों पर नजर रखना आसान होगा।

आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद बाघिन को सुरक्षित परिवहन व्यवस्था के जरिए गोरखपुर हवाई अड्डे तक पहुंचाया गया। यहां से भारतीय वायु सेना के विशेष विमान द्वारा उसे पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व ले जाया गया। इस पूरी प्रक्रिया में बाघिन की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी गई।

करीब 15 घंटे में पूरा हुआ पूरा अभियान

वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में बाघिन को बेहोश किए जाने से लेकर उसके नए संरक्षण क्षेत्र तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया करीब 15 घंटे में सफलतापूर्वक पूरी हुई। 29 सितंबर की शाम करीब 5 बजे शुरू हुआ यह अभियान 30 सितंबर की सुबह करीब 8 बजे अपने महत्वपूर्ण चरण तक पहुंचा, जब बाघिन को बक्सा टाइगर रिजर्व के निर्धारित सॉफ्ट-रिलीज एनक्लोजर में सुरक्षित पहुंचा दिया गया।

इतने कम समय में स्थानांतरण पूरा करना वन्यजीव प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। लंबी दूरी के परिवहन के दौरान किसी जंगली जानवर के स्वास्थ्य और तनाव को नियंत्रित रखना चुनौतीपूर्ण होता है। इसलिए पूरी प्रक्रिया को निर्धारित पशु चिकित्सा और वन्यजीव प्रबंधन प्रोटोकॉल के अनुसार अंजाम दिया गया।

फिलहाल विशेष एनक्लोजर में रहेगी बाघिन

बक्सा टाइगर रिजर्व पहुंचने के बाद बाघिन को फिलहाल विशेष रूप से तैयार किए गए सॉफ्ट-रिलीज एनक्लोजर में रखा गया है। इसका उद्देश्य उसे अचानक खुले जंगल में छोड़ने के बजाय धीरे-धीरे नए वातावरण के अनुकूल होने का अवसर देना है। वन विभाग के अधिकारी और वन्यजीव विशेषज्ञ लगातार उसके स्वास्थ्य, गतिविधियों और व्यवहार की निगरानी कर रहे हैं।

बाघिन नए जंगल के वातावरण में किस तरह प्रतिक्रिया देती है, वह भोजन और आसपास के क्षेत्र के साथ कैसे अनुकूलन करती है तथा उसका व्यवहार कैसा रहता है, इन सभी पहलुओं पर नजर रखी जाएगी। योजना के अनुसार, 2 अक्टूबर को उसे एनक्लोजर से निकालकर बड़े वन क्षेत्र में छोड़े जाने की तैयारी है।

बिहार और पश्चिम बंगाल के वन विभाग की अहम भूमिका

इस ऐतिहासिक स्थानांतरण अभियान में बिहार और पश्चिम बंगाल के वन विभागों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनके साथ भारतीय वन्यजीव संस्थान और भारतीय वायु सेना का भी सहयोग रहा। अभियान में वन्यजीव विशेषज्ञों, पशु चिकित्सकों, वन अधिकारियों और दोनों राज्यों के मैदानी वनकर्मियों ने मिलकर काम किया।

बाघिन को सुरक्षित पकड़ने से लेकर रेडियो-कॉलर लगाने, चिकित्सकीय निगरानी, सड़क मार्ग से गोरखपुर पहुंचाने और फिर विशेष विमान से बक्सा टाइगर रिजर्व तक ले जाने की प्रक्रिया में कई स्तरों पर समन्वय की आवश्यकता थी। सभी संबंधित एजेंसियों के बीच तालमेल के चलते यह अभियान सफलतापूर्वक पूरा किया गया।

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण में बिहार की बढ़ी भागीदारी

वाल्मीकि टाइगर रिजर्व देश के महत्वपूर्ण तराई वन परिदृश्य का हिस्सा है और बिहार में बाघ संरक्षण के लिए इसका विशेष महत्व है। यहां बाघों के संरक्षण और उनके प्राकृतिक आवास को बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए जाते रहे हैं। अब बिहार से बाघिन को दूसरे राज्य के टाइगर रिजर्व में संरक्षण कार्यक्रम के लिए स्थानांतरित किया जाना राज्य के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की एक नई कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

भारत में बाघ संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट टाइगर सहित कई योजनाएं संचालित की जाती हैं। भारत दुनिया में बाघ संरक्षण के सबसे महत्वपूर्ण देशों में शामिल है और यहां वैश्विक बाघ आबादी का बड़ा हिस्सा पाया जाता है। हालांकि बाघों के संरक्षण के सामने उनके प्राकृतिक आवास का दबाव और मानव-बाघ संघर्ष जैसी चुनौतियां भी मौजूद हैं।

मानव-बाघ संघर्ष के बीच संरक्षण की चुनौती

बाघों की संख्या और उनके संरक्षण के साथ-साथ उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना भी बेहद जरूरी है। जंगलों और बाघों के प्राकृतिक क्षेत्र पर बढ़ते दबाव के कारण कई इलाकों में मानव-बाघ संघर्ष की घटनाएं सामने आती हैं। ऐसे में बाघों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित वन क्षेत्र उपलब्ध कराना संरक्षण नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बक्सा टाइगर रिजर्व में बाघिन का स्थानांतरण इसी व्यापक संरक्षण प्रयास से जुड़ा है। रेडियो-कॉलर के जरिए उसकी गतिविधियों पर नजर रखकर विशेषज्ञ उसके नए आवास में अनुकूलन को समझ सकेंगे। बिहार से दूसरे राज्य में बाघिन का यह पहला संरक्षण-आधारित स्थानांतरण भविष्य में वन्यजीव प्रबंधन और बाघ संरक्षण के लिए अंतरराज्यीय सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी बन सकता है।

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