प्रधानमंत्री मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने पश्चिम एशिया में शांति और होर्मुज जलडमरूमध्य के महत्व पर चर्चा की। जानिए इस ऐतिहासिक शांति प्रक्रिया के बारे में।
हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेज़ेशकियन के बीच हुई टेलीफोन पर बातचीत ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम को जन्म दिया है। यह चर्चा ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया लंबे समय से जारी तनाव और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा था। इस बातचीत का मुख्य केंद्र बिंदु न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा रहा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवन-रेखा मानी जाने वाली ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना भी था। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत के लिए और संपूर्ण विश्व के लिए इस मार्ग का निर्बाध संचालन अत्यंत आवश्यक है।
पश्चिम एशिया में शांति और राजनयिक प्रयास
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर इस वार्ता की पुष्टि करते हुए कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति पेज़ेशकियन के साथ पश्चिम एशिया में हुए हालिया घटनाक्रमों पर चर्चा की है। मोदी ने क्षेत्र में जारी वार्ता प्रक्रिया में हुई प्रगति का स्वागत करते हुए आशा व्यक्त की कि निरंतर प्रयासों से क्षेत्र में स्थायी शांति बहाल होगी। भारत का यह रुख सदैव स्पष्ट रहा है कि युद्ध और संघर्ष किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकते। भारत हमेशा से ही बातचीत और कूटनीति के माध्यम से विवादों को सुलझाने का प्रबल समर्थक रहा है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सभी संबंधित पक्षों को जिम्मेदारी के साथ कार्य करने की आवश्यकता है।
यह शांति प्रक्रिया रातों-रात नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे कई हफ्तों की कड़ी मेहनत छिपी है। 18 जून को अमेरिका और ईरान के बीच ‘इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन’ (Islamabad MoU) पर हस्ताक्षर किए गए, जिसका मुख्य उद्देश्य पश्चिम एशिया में शांति बहाल करना और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े विवादित मुद्दों पर आगे बढ़ना था। यह उल्लेखनीय है कि इस शांति प्रक्रिया में पाकिस्तान और कतर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। 8 अप्रैल को हुए दो सप्ताह के संघर्ष विराम समझौते ने नींव रखने का काम किया, जिसे बाद में बातचीत के पूर्ण होने तक बढ़ा दिया गया था।
होर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का आधार
इस कूटनीतिक हलचल का सबसे बड़ा सकारात्मक परिणाम होर्मुज जलडमरूमध्य का पुनः खुलना है। यह संकरा जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए किसी धमनी से कम नहीं है। सामान्य परिस्थितियों में, दुनिया की कुल ऊर्जा आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। 28 फरवरी से, जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर संयुक्त हमले शुरू किए थे, तब से इस जलमार्ग में जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हो गई थी। इस व्यवधान ने न केवल क्षेत्रीय देशों को बल्कि वैश्विक स्तर पर कई देशों में ऊर्जा संकट को जन्म दिया था। इस जलमार्ग का पुनः खुलना भारत जैसे देशों के लिए एक बड़ी राहत है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं।
भविष्य की राह और कूटनीतिक प्रतिनिधित्व
शांति बहाली के इस दौर के बीच, ईरान ने एक महत्वपूर्ण निमंत्रण भी दिया है। ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खमेनई के अंतिम संस्कार के लिए राष्ट्रपति पेज़ेशकियन ने प्रधानमंत्री मोदी को आमंत्रित किया है। यह समारोह 5 जुलाई से 9 जुलाई के बीच आयोजित किया जाएगा। इस निमंत्रण को भारत के प्रति ईरान की सम्मानजनक दृष्टि और दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संबंधों की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार, भारत सरकार ने इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण अवसर पर अपने प्रतिनिधियों को भेजने का निर्णय लिया है। सरकार की योजना के अनुसार, बिहार के राज्यपाल अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए इस समारोह में शामिल होंगे। यह निर्णय भारत के संतुलित और परिपक्व विदेश नीति के दृष्टिकोण को दर्शाता है, जहाँ हम अपने मित्र राष्ट्रों के साथ सुख-दुःख के पलों में भी खड़े रहते हैं।
ईरान और भारत के बीच यह संवाद केवल दो देशों की बातचीत नहीं है, बल्कि यह एक बड़े वैश्विक संदर्भ का हिस्सा है। पश्चिम एशिया में शांति का अर्थ है वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता। भारत अपनी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना के साथ हमेशा विश्व शांति के प्रयासों में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए तत्पर रहा है। आने वाले समय में, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिका, ईरान और अन्य क्षेत्रीय शक्तियां इस शांति समझौते को कितनी मजबूती से लागू रखती हैं, ताकि दुनिया एक और बड़े ऊर्जा संकट से बची रहे।