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ज्येष्ठ माह के पहले ‘बड़ा मंगल’ पर हनुमान जी की विशेष पूजा और आरती का महत्व। जानें क्यों लखनऊ और उत्तर भारत में इस दिन का है खास उल्लास।
ज्येष्ठ मास के पावन महीने की शुरुआत के साथ ही उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश में ‘बड़ा मंगल’ का उत्साह चरम पर होता है। यह परंपरा न केवल धार्मिक है, बल्कि सामाजिक समरसता और सेवा का भी प्रतीक है। ज्येष्ठ माह के पहले बड़े मंगल पर भक्त हनुमान जी की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन मंदिरों में सुबह से ही भक्तों का तांता लगा रहता है और ‘जय श्री राम’ व ‘जय हनुमान’ के जयकारों से वातावरण गूंज उठता है। हनुमान जी की आरती इस दिन की सबसे महत्वपूर्ण क्रिया है, जो भक्तों के भीतर नई ऊर्जा और भक्ति का संचार करती है।
बड़ा मंगल का महत्व और इतिहास
‘बड़ा मंगल’ या ‘बुढ़वा मंगल’ की परंपरा मुख्य रूप से लखनऊ से शुरू हुई थी। माना जाता है कि मुगल काल के दौरान नवाबों ने भी इस त्योहार को अपना समर्थन दिया था, जिससे यह हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बन गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ मास के मंगलवार को ही भगवान हनुमान की मुलाकात प्रभु श्री राम से हुई थी। इसके अलावा, महाभारत काल में भीम का अहंकार तोड़ने के लिए हनुमान जी ने इसी महीने के मंगलवार को एक वृद्ध वानर का रूप धारण किया था, इसलिए इसे ‘बुढ़वा मंगल’ भी कहा जाता है। पहले बड़े मंगल पर हनुमान जी की आरती का गान करने से जीवन के सभी मंगल (अशुभ) दूर हो जाते हैं और सुख-समृद्धि का वास होता है।
हनुमान जी की आरती: भक्ति का चरम आनंद
किसी भी पूजा की पूर्णता आरती से होती है। हनुमान जी की आरती “आरती कीजे हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की” का गायन ज्येष्ठ के पहले मंगल पर विशेष फलदायी माना जाता है। इस आरती की हर पंक्ति हनुमान जी के शौर्य, शक्ति और उनकी राम-भक्ति का गुणगान करती है। जब भक्त सामूहिक रूप से दीप जलाकर और शंख ध्वनि के साथ इस आरती को गाते हैं, तो ऐसा माना जाता है कि साक्षात् हनुमान जी वहां अदृश्य रूप में उपस्थित होते हैं। आरती के समय मन की शुद्धि और पूर्ण समर्पण ही हनुमान जी की कृपा पाने का एकमात्र मार्ग है।
पूजा विधि और विशेष भोग
पहले बड़े मंगल पर भक्त सुबह जल्दी स्नान कर लाल वस्त्र धारण करते हैं। हनुमान जी को सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित किया जाता है, जिसे ‘चोला चढ़ाना’ कहते हैं। इसके बाद उन्हें लाल फूल, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं। इस दिन बूंदी के लड्डू या बेसन के लड्डू का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। बहुत से भक्त इस दिन सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ भी करते हैं। पूजा के अंत में कपूर से हनुमान जी की आरती उतारी जाती है और फिर प्रसाद का वितरण किया जाता है।
सेवा और भंडारे की परंपरा
बड़ा मंगल केवल मंदिर में पूजा तक सीमित नहीं है। इस दिन सड़कों के किनारे जगह-जगह भंडारों का आयोजन किया जाता है। चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी में राहगीरों को ठंडा पानी, शरबत, पूड़ी-सब्जी और हलवा खिलाना इस त्योहार की सबसे सुंदर विशेषता है। भक्त मानते हैं कि भूखे को भोजन कराना और प्यासे को पानी पिलाना ही हनुमान जी की सच्ची सेवा है। यह दिन जात-पात और धर्म से ऊपर उठकर मानवता की सेवा का संदेश देता है।
श्री हनुमान जी की आरती (पाठ हेतु)
आरती कीजे हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके॥
अंजनि पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई॥
दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥
लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज संवारे॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि सजीवन प्रान उबारे॥
पैठि पाताल तोरि जम-कारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥
बाएं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे॥
सुर नर मुनि आरती उतारें। जय जय जय हनुमान उचारें॥
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरति करत अंजना माई॥
जो हनुमानजी की आरति गावै। बसि बैकुण्ठ परम पद पावै॥