क्रेडाई ने किफायती आवास की 45 लाख रुपये की अधिकतम सीमा हटाने की मांग की है। संगठन ने घरों की बढ़ती लागत और टैक्स के दबाव को देखते हुए नीतिगत प्रोत्साहन देने की अपील की है।
देश में किफायती आवास यानी Affordable Housing की उपलब्धता बढ़ाने को लेकर रियल एस्टेट सेक्टर ने सरकार से नीतिगत बदलाव की मांग की है। रियल एस्टेट कंपनियों के संगठन क्रेडाई (CREDAI) का कहना है कि जमीन की कीमतों, निर्माण लागत और विभिन्न प्रकार के टैक्स में बढ़ोतरी के कारण डेवलपर्स के लिए 45 लाख रुपये तक कीमत वाले किफायती मकान बनाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। संगठन ने सरकार से ऐसी नीतियां बनाने की मांग की है, जिससे सस्ते घरों की मांग और आपूर्ति दोनों को बढ़ावा मिल सके।
किफायती घरों की सप्लाई पर बढ़ता दबाव
क्रेडाई के मुताबिक, मौजूदा समय में रियल एस्टेट डेवलपर्स के सामने कई तरह की लागत संबंधी चुनौतियां हैं। जमीन की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ-साथ निर्माण सामग्री, श्रम और दूसरी निर्माण लागत भी बढ़ी है। दूसरी ओर, घरों की बिक्री से जुड़े टैक्स का बोझ भी डेवलपर्स पर पड़ रहा है। इन सभी कारणों का सीधा असर किफायती आवास परियोजनाओं की व्यवहार्यता पर पड़ रहा है।
क्रेडाई का कहना है कि ऐसे समय में जब आम लोगों के लिए अपना घर खरीदना पहले से ही एक बड़ी आर्थिक चुनौती है, डेवलपर्स के लिए कम कीमत वाले मकान उपलब्ध कराना भी कठिन होता जा रहा है। संगठन का मानना है कि अगर नीतिगत स्तर पर राहत नहीं दी गई तो किफायती आवास की सप्लाई और मांग के बीच अंतर बढ़ सकता है।
45 लाख रुपये की अधिकतम सीमा खत्म करने की मांग
क्रेडाई के अध्यक्ष शेखर पटेल ने शुक्रवार को एक संवाददाता सम्मेलन में किफायती आवास की मौजूदा परिभाषा में बदलाव की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि सरकार को प्रत्येक फ्लैट के लिए 45 लाख रुपये की अधिकतम कीमत की सीमा को खत्म करने पर विचार करना चाहिए। उनके अनुसार, मौजूदा कीमत सीमा अलग-अलग शहरों में जमीन और निर्माण लागत के अंतर को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखती।
पटेल ने कहा कि संगठन चाहता है कि किफायती मकान की पहचान केवल उसकी कीमत से नहीं बल्कि उसके क्षेत्रफल के आधार पर भी की जाए। क्रेडाई की मांग है कि महानगरों में 60 वर्ग मीटर और गैर-महानगरों में 90 वर्ग मीटर तक के मकानों को किफायती आवास की श्रेणी में शामिल किया जाए।
जमीन और निर्माण लागत बनी बड़ी चुनौती
रियल एस्टेट सेक्टर में जमीन की कीमत को किफायती आवास की राह में एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है। खासकर बड़े शहरों और महानगरों में जमीन महंगी होने के कारण कम कीमत में घर उपलब्ध कराना डेवलपर्स के लिए मुश्किल होता है। इसके अलावा सीमेंट, स्टील, श्रम और अन्य निर्माण गतिविधियों पर होने वाला खर्च भी परियोजनाओं की कुल लागत को प्रभावित करता है।
क्रेडाई के अनुसार, जब इन लागतों के साथ टैक्स का बोझ भी जुड़ता है तो 45 लाख रुपये की अधिकतम कीमत के भीतर परियोजना को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। संगठन का कहना है कि लागत में बढ़ोतरी का असर अंततः घर की अंतिम कीमत पर भी पड़ सकता है।
बिक्री मूल्य का 30 से 50 प्रतिशत तक टैक्स का दावा
क्रेडाई अध्यक्ष शेखर पटेल ने कहा कि डेवलपर्स को बिक्री मूल्य का लगभग 30 से 50 प्रतिशत तक हिस्सा केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और नगर निगमों को विभिन्न प्रकार के टैक्स के रूप में चुकाना पड़ता है। संगठन का कहना है कि जमीन की कीमत और निर्माण लागत के साथ यह टैक्स बोझ किफायती आवास की सप्लाई बढ़ाने में प्रमुख बाधाओं में शामिल है।
पटेल ने कहा कि रियल एस्टेट उद्योग इन चुनौतियों का समाधान निकालने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है। उनका कहना है कि सरकार और उद्योग के बीच नीतिगत स्तर पर समन्वय बढ़ने से किफायती आवास क्षेत्र को गति मिल सकती है।
अगले छह महीनों में नीतिगत पहल की उम्मीद
क्रेडाई ने उम्मीद जताई है कि अगले छह महीनों में सरकार की ओर से किफायती आवास की मांग और सप्लाई बढ़ाने के लिए कुछ नीतिगत कदम उठाए जा सकते हैं। संगठन लगातार सरकार के साथ इस मुद्दे पर बातचीत कर रहा है और चाहता है कि मौजूदा नियमों को बदलते बाजार और निर्माण लागत के अनुरूप बनाया जाए।
क्रेडाई की मांग पूरी होने पर किफायती आवास की मौजूदा परिभाषा में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है। खास तौर पर 45 लाख रुपये की कीमत सीमा हटाकर क्षेत्रफल आधारित मानक लागू करने से अलग-अलग शहरों में घरों की कीमत और जमीन की लागत के अंतर को बेहतर तरीके से ध्यान में रखा जा सकेगा।
आम घर खरीदारों पर भी पड़ेगा असर
किफायती आवास की सप्लाई बढ़ने का सीधा संबंध मध्यम और निम्न आय वर्ग के घर खरीदारों से है। अगर डेवलपर्स को लागत और टैक्स के स्तर पर राहत मिलती है तथा किफायती आवास की परिभाषा में बदलाव किया जाता है, तो इससे अधिक परियोजनाओं को इस श्रेणी में लाने की संभावना बन सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर सरकार की ओर से लिए जाने वाले नीतिगत फैसलों और उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
फिलहाल क्रेडाई ने 45 लाख रुपये की अधिकतम सीमा हटाने और क्षेत्रफल आधारित मानक लागू करने की मांग रखी है। आने वाले समय में सरकार इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाती है, यह रियल एस्टेट सेक्टर के साथ-साथ किफायती घर की तलाश कर रहे लाखों खरीदारों के लिए भी महत्वपूर्ण होगा।