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दुनिया भर में मोटापे की समस्या बढ़ रही है, लेकिन जापान एक अपवाद है। जानिए वहां की पैदल चलने की आदत, भोजन और शहरी डिज़ाइन के बारे में, जो स्वास्थ्य को बेहतर रखते हैं।
दुनिया भर के देश आज मोटापे (obesity) की बढ़ती समस्या से जूझ रहे हैं, जहां जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी दबाव डाल रही हैं। इस वैश्विक परिदृश्य में जापान लंबे समय से एक ‘अपवाद’ (outlier) की तरह खड़ा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के आंकड़ों के अनुसार, जापान की एक बहुत छोटी आबादी ही मोटापे की शिकार है। यह स्थिति संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों के बिल्कुल विपरीत है, जहां मोटापा सबसे गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताओं में से एक बन गया है। फिटनेस कोच डैन गो ने हाल ही में अपनी जापान यात्रा के बाद सोशल मीडिया पर एक चर्चा छेड़ दी, जिसमें उन्होंने बताया कि वहां का स्वास्थ्य किसी विशेष ‘ट्रेंडी डाइट’ या ‘क्रांतिकारी फिटनेस प्रोग्राम’ का परिणाम नहीं है, बल्कि यह वहां की दैनिक जीवनशैली का हिस्सा है।
दैनिक जीवन का हिस्सा: ‘अनजाने’ में फिटनेस
जापान ने एक ऐसा वातावरण बनाया है जहां स्वस्थ आदतें स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती हैं। वहां ‘पैदल चलना’ दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग है। लाखों लोग परिवहन के लिए ट्रेनों और सार्वजनिक साधनों पर निर्भर हैं। चाहे काम पर जाना हो, स्कूल जाना हो या छोटे-मोटे काम निपटाना हो, वहां के निवासी अनजाने में ही दिन भर में काफी लंबी दूरी पैदल तय कर लेते हैं। वे इसे कोई अलग से ‘एक्सरसाइज’ या ‘कसरत’ नहीं मानते, बल्कि यह उनके आने-जाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके विपरीत, कई पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका के शहर ‘कार-केंद्रित’ (car-oriented) डिज़ाइन किए गए हैं, जिससे लोगों को शारीरिक गतिविधि के अवसर बहुत कम मिलते हैं।
खान-पान की संस्कृति: संयम और संतुलन
जापान की खाद्य संस्कृति मोटापे को रोकने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पारंपरिक जापानी भोजन मुख्य रूप से मछली, सब्जियों, चावल, सूप और किण्वित (fermented) खाद्य पदार्थों के इर्द-गिर्द केंद्रित होता है। वहां भोजन की मात्रा (portion sizes) पश्चिमी देशों की तुलना में काफी छोटी होती है। इसके अलावा, अत्यधिक प्रसंस्कृत (highly processed) खाद्य पदार्थ वहां के औसत आहार में बहुत कम जगह पाते हैं। वहां की संस्कृति में ‘हारा हाची बू’ (Hara Hachi Bu) का सिद्धांत प्रचलित है, जिसका अर्थ है—पेट के 80 प्रतिशत भरने तक ही खाना। यह एक ऐसी आदत है जो ओवरईटिंग को पूरी तरह से नियंत्रित करती है।
शहरी डिजाइन और ‘सक्रिय वातावरण’
विशेषज्ञ लंबे समय से तर्क देते रहे हैं कि मोटापा केवल व्यक्तिगत पसंद का परिणाम नहीं है। शहरी डिज़ाइन, परिवहन प्रणाली, भोजन की उपलब्धता और खाने के प्रति सांस्कृतिक दृष्टिकोण सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणामों को आकार देते हैं। जापानी शहर ‘सक्रिय वातावरण’ (active environments) के बेहतरीन उदाहरण माने जाते हैं, जो लोगों को हिलने-डुलने और सक्रिय रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। जब किसी शहर की बनावट ऐसी हो कि आपको स्टेशन तक पैदल जाना ही है, तो शारीरिक गतिविधि स्वतः ही जीवन का एक अनिवार्य नियम बन जाती है।
खाने के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण और आदतें
जापानी संस्कृति में भोजन के प्रति सामाजिक व्यवहार भी बहुत महत्वपूर्ण है। धीरे-धीरे खाना, संतुलित मात्रा में सेवन करना और बार-बार स्नैक्स खाने (snacking) से बचना वहां की गहरी जड़ें जमाई हुई आदतें हैं। वहां के लोग किसी ‘प्रतिबंधित डाइट’ (restrictive diet) पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय ‘संयम’ (moderation) और ‘निरंतरता’ (consistency) को महत्व देते हैं। वहां भोजन को एक उत्सव की तरह धीरे-धीरे और शांति से खाने की परंपरा है, जो पाचन में भी मदद करती है और व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा खाने से रोकती है।
सीख और निष्कर्ष
जापान का मॉडल हमें यह सिखाता है कि स्वस्थ रहने के लिए किसी कठोर शासन या महंगी जिम मेंबरशिप की आवश्यकता नहीं है। यदि हम अपने शहरों के डिज़ाइन को थोड़ा अधिक पैदल चलने योग्य (pedestrian-friendly) बनाएं, यदि हम प्रोसेस्ड फूड की जगह पारंपरिक और ताजे भोजन को प्राथमिकता दें, और यदि हम ‘संयम’ के साथ खाने की कला सीखें, तो हम भी एक बेहतर और स्वस्थ समाज की नींव रख सकते हैं। मोटापा केवल कैलोरी का गणित नहीं है, यह एक ऐसी संस्कृति का परिणाम है जिसे हमने अपनाया है। जापान ने यह सिद्ध किया है कि यदि पर्यावरण स्वस्थ विकल्पों को आसान बना दे, तो स्वस्थ रहना किसी संघर्ष का नाम नहीं, बल्कि जीवन का एक सहज तरीका बन जाता है।